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Three key rulings by the Bilaspur High Court: a reasoned notice is mandatory before eviction; a four-month extension granted for the trial of a foreign national; and reinstatement of employment denied after 21 years.
बिलासपुर। बिलासपुर हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि सरकारी या रेलवे की जमीन से किसी भी कथित अतिक्रमणकारी को हटाने से पहले कानून के तहत स्पष्ट कारणों वाला नोटिस देना अनिवार्य है। जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की एकल पीठ ने दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे की रिट याचिका खारिज करते हुए जिला अदालत के आदेश को बरकरार रखा।
यह मामला बिलासपुर रेलवे स्टेशन के पास स्थित बुधवारी बाजार का है, जहां रेलवे ने असलम हुसैन को लोक परिसर (अप्राधिकृत अधिभोगियों की बेदखली) अधिनियम, 1971 के तहत अवैध कब्जाधारी मानते हुए बेदखली का आदेश जारी किया था। जिला अदालत ने 15 मई 2026 को रेलवे का आदेश निरस्त कर मामले को सक्षम अधिकारी के पास नए सिरे से सुनवाई के लिए भेज दिया था। हाई कोर्ट ने माना कि शुरुआती नोटिस में बेदखली के स्पष्ट आधार नहीं बताए गए थे और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुसार किसी भी दंडात्मक कार्रवाई से पहले कारणयुक्त एवं वैध नोटिस देना आवश्यक है।
बिलासपुर हाई कोर्ट ने नाइजीरियाई नागरिक जानसन सैमुअल से जुड़े आपराधिक मामले में राजनांदगांव की ट्रायल कोर्ट को सुनवाई पूरी करने के लिए चार माह का अतिरिक्त समय दिया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की एकलपीठ ने ट्रायल कोर्ट द्वारा मांगे गए छह माह के बजाय चार माह की मोहलत प्रदान की।
जानसन सैमुअल के पास घाना गणराज्य का पासपोर्ट है और उसके खिलाफ डोंगरगांव थाने में आपराधिक मामला दर्ज है। इससे पहले 19 मार्च 2026 को हाई कोर्ट ने उसकी जमानत याचिका खारिज करते हुए चार सप्ताह में ट्रायल पूरा करने का निर्देश दिया था। हालांकि, प्रक्रियात्मक औपचारिकताओं और आवश्यक दस्तावेजों की अनुपलब्धता के कारण सुनवाई समय पर पूरी नहीं हो सकी, जिसके बाद अदालत ने नया समय निर्धारित किया।
उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच ने शिक्षा गारंटी योजना के तहत नियुक्त एक शिक्षक की 21 वर्ष बाद नौकरी बहाल करने की मांग खारिज कर दी। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की पीठ ने कहा कि सेवा समाप्ति मौखिक रूप से होने का दावा भी इतने लंबे समय तक न्यायालय का दरवाजा न खटखटाने का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि अत्यधिक विलंब के बाद दायर की गई याचिकाओं को स्वीकार नहीं किया जा सकता और ऐसे मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप उचित नहीं है।