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Weak monsoon rainfall raises concerns; 282 districts across the country face the threat of drought... focus on several states, including Maharashtra and Karnataka.
नई दिल्ली: इस साल मानसून के दौरान देश के बड़े हिस्से में सामान्य से कम बारिश होने के कारण सूखे का खतरा बढ़ गया है। भारत मौसम विभाग के आंकड़ों के मुताबिक जून से सितंबर तक देश में औसतन 759.4 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, जो दीर्घकालिक औसत का करीब 87 प्रतिशत है। वर्ष 1901 के बाद यह 13वीं सबसे कम मानसूनी बारिश है। वर्ष 2001 के बाद भी यह चौथा सबसे कमजोर मानसून रहा।
बारिश के वितरण में भी इस बार काफी अंतर देखने को मिला। देश के 741 जिलों के आंकड़ों के मुताबिक 282 जिलों में सामान्य से कम बारिश हुई। यह कुल जिलों का करीब 38 प्रतिशत है। इनमें 34 जिले ऐसे हैं, जहां सामान्य से 60 प्रतिशत या उससे ज्यादा बारिश कम दर्ज की गई।16 जिलों में अत्यधिक बारिश और 90 जिलों में सामान्य से अधिक बारिश हुई। 312 जिलों में बारिश सामान्य रही। सात जिलों के लिए बारिश का आकलन उपलब्ध नहीं हो सका।
कम बारिश वाले राज्यों में पंजाब, राजस्थान और विदर्भ प्रमुख हैं। पंजाब में सामान्य से 41 प्रतिशत कम बारिश हुई, जबकि राजस्थान में 22 प्रतिशत और विदर्भ में 27 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।इसके उलट ओडिशा में सामान्य से करीब 30 प्रतिशत ज्यादा बारिश हुई। सितंबर के अंतिम सप्ताह में देश में बारिश की कमी करीब 15 प्रतिशत थी। अंतिम सप्ताह की बारिश के बाद पूरे मानसून सीजन की कमी घटकर करीब 12.6 प्रतिशत रह गई, लेकिन कई क्षेत्रों में जल संकट और फसल नुकसान का खतरा बना हुआ है।
महाराष्ट्र सरकार ने 265 तहसीलों को सूखा प्रभावित घोषित किया है। कर्नाटक में भी खरीफ सीजन के लिए सूखा प्रभावित तालुकों की घोषणा की गई है। केंद्र की टीम तीन अक्टूबर से कर्नाटक में जमीनी स्थिति का आकलन करेगी।केंद्र सरकार की नजर कर्नाटक के अलावा महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और राजस्थान की स्थिति पर भी है। राज्यों से मिलने वाली जानकारी और जमीनी आकलन के आधार पर सहायता को लेकर आगे फैसला किया जाएगा।
मानसून कमजोर रहने का असर खरीफ फसलों के रकबे पर भी पड़ा है। कुल खरीफ बोआई का रकबा पिछले वर्ष के आसपास रहा, लेकिन धान की खेती का क्षेत्र करीब 16.32 लाख हेक्टेयर कम हुआ है।महाराष्ट्र, तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, राजस्थान और गुजरात में कुल खेती के क्षेत्र में कमी दर्ज की गई। दूसरी ओर कुछ फसलों की बोआई में बढ़ोतरी हुई है। उड़द, बाजरा, ज्वार, तिल, सूरजमुखी, मूंग और अरहर का रकबा बढ़ा है।
किसी क्षेत्र में सूखे की स्थिति का आकलन केवल बारिश के आंकड़ों के आधार पर नहीं किया जाता। फसल की स्थिति, मिट्टी में नमी, जलस्रोतों की उपलब्धता, बोआई की स्थिति और सिंचाई के लिए पानी जैसे कई पहलुओं को भी देखा जाता है।सूखा प्रभावित क्षेत्र का आकलन स्थानीय स्तर पर वैज्ञानिक अध्ययन और जमीनी सर्वे के आधार पर किया जाता है। केंद्र सरकार सीधे किसी जिले को सूखा प्रभावित घोषित नहीं करती। राज्य सरकारें आकलन के बाद राष्ट्रीय आपदा मोचन निधि से सहायता की मांग कर सकती हैं।
देश में मानसून की कुल कमी भले ही अंतिम सप्ताह की बारिश के बाद कुछ कम हुई हो, लेकिन अलग-अलग क्षेत्रों में बारिश का असमान वितरण चिंता का विषय बना हुआ है। अब राज्यों से मिलने वाली रिपोर्ट और फसलों की वास्तविक स्थिति से यह स्पष्ट होगा कि कम बारिश का असर किस स्तर तक पहुंचा है और किन क्षेत्रों को सरकारी सहायता की जरूरत पड़ सकती है।