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Where children once feared to hold the Tricolour, the national anthem will now resound—a new dawn of freedom in the villages of Dantewada.
दंतेवाड़ा। बस्तर के जिन गांवों में दशकों तक नक्सलवाद का खौफ राष्ट्रीय पर्वों पर भारी रहा, वहां अब बदलाव की नई तस्वीर सामने आ रही है। दंतेवाड़ा जिले के लावा, बड़ेपल्ली और बैनपाल गांवों में पहली बार स्वतंत्रता दिवस को लेकर उत्साह दिखाई दे रहा है। कभी यहां तिरंगा फहराने की कल्पना भी मुश्किल थी, लेकिन अब बच्चे हाथों में राष्ट्रीय ध्वज लेकर पूरे जोश के साथ तिरंगा यात्रा निकाल रहे हैं और भारत माता की जय के नारों से गांव गूंज रहे हैं।
इन गांवों में लंबे समय तक नक्सली प्रभाव इतना गहरा था कि स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व खुले तौर पर नहीं मनाए जा सकते थे। ग्रामीणों के अनुसार, हर वर्ष 15 अगस्त के मौके पर तिरंगे की जगह काला झंडा फहराया जाता था और लोगों में भय का माहौल बना रहता था। ऐसे हालात में बच्चों के लिए तिरंगा हाथ में लेना भी जोखिम माना जाता था।
स्थिति बदलने के बाद अब गांवों में पहली बार स्कूली बच्चों ने तिरंगा यात्रा निकाली। शुरुआत में कई बच्चे झिझक रहे थे और राष्ट्रीय ध्वज उठाने से भी डर महसूस कर रहे थे। शिक्षकों ने उन्हें भरोसा दिलाया कि अब माहौल बदल चुका है और बिना किसी भय के राष्ट्रीय पर्व मनाया जा सकता है। इसके बाद बच्चों ने पूरे उत्साह के साथ गांव की गलियों में तिरंगा लेकर मार्च किया और देशभक्ति के नारे लगाए।
लावा, बड़ेपल्ली और बैनपाल उन इलाकों में शामिल रहे हैं, जहां लंबे समय तक प्रशासनिक गतिविधियां लगभग ठप थीं। सरकारी योजनाओं और शैक्षणिक व्यवस्था का असर भी सीमित था। अब इन गांवों में स्कूल शुरू होने के साथ शिक्षा का नया दौर शुरू हुआ है और राष्ट्रीय आयोजनों की तैयारियां भी तेजी से चल रही हैं।
इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस इन गांवों के लिए ऐतिहासिक बनने जा रहा है। लगभग 46 वर्षों बाद यहां आधिकारिक रूप से तिरंगा फहराने की तैयारी की गई है। जिन बच्चों ने अब तक स्वतंत्रता दिवस केवल किताबों या दूसरे गांवों में देखा था, वे पहली बार अपने ही गांव में राष्ट्रीय ध्वज को सलामी देंगे।
कुआकोंडा विकासखंड के शिक्षा अधिकारियों के अनुसार, स्वतंत्रता दिवस की सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए शिक्षक 14 अगस्त को ही गांव पहुंच जाएंगे और वहीं रुकेंगे, ताकि 15 अगस्त को समय पर ध्वजारोहण कराया जा सके। फिलहाल स्कूल भवन का निर्माण प्रस्तावित है, इसलिए शिक्षक ग्रामीणों के घरों में रात्रि विश्राम करेंगे। नदी-नालों और कठिन रास्तों को पार कर शिक्षक नियमित रूप से बच्चों तक शिक्षा पहुंचा रहे हैं।
लावा, बड़ेपल्ली और बैनपाल की यह तस्वीर केवल तीन गांवों का बदलाव नहीं, बल्कि उस बस्तर की बदलती पहचान का प्रतीक है, जहां कभी भय का माहौल था और आज वहां शिक्षा, तिरंगा और राष्ट्रभक्ति नई उम्मीद लेकर पहुंच रहे हैं।