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ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत की खबरों के बाद उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिला चर्चा में आ गया है। खामेनेई के गुरु रूहोल्लाह खुमैनी के पूर्वज बाराबंकी के छोटे किंटूर गांव से जुड़े बताए जाते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि ईरान की 1979 की इस्लामिक क्रांति में इस गांव के वंशजों की भी भागीदारी रही थी।
स्थानीय लोगों के अनुसार, बाराबंकी के लोग नवाबों के साथ ईरान की धार्मिक यात्राओं में शामिल होते थे। इस्लामिक क्रांति के प्रमुख नेता रूहोल्लाह खुमैनी के दादा सैयद अहमद मुसावी 18वीं–19वीं शताब्दी के दौरान बाराबंकी के किंटूर गांव में रहते थे।
सैय्यद निहाल मियां, जो खुमैनी के वंशजों में से हैं, ने खामेनेई की मौत को दुखद बताते हुए कहा, “खामेनेई का सरोकार मजहब और मिल्लत से ऊपर उठकर इंसानियत से था।” वहीं, इतिहासकार डॉ. रेहान काजमी ने इसे शहादत बताते हुए अपूरणीय क्षति बताया।
सैयद अहमद मुसावी का जन्म 19वीं सदी की शुरुआत में किंटूर गांव में हुआ था। यह गांव शिया इस्लामी शिक्षा का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता था। शिक्षा पूरी करने के बाद सैयद अहमद मुसावी 1830 में ब्रिटिश भारत से इराक के नजफ शहर की धार्मिक यात्रा पर गए। इसके बाद उन्होंने नजफ और फिर ईरान के खुमैन शहर में स्थायी रूप से बसने का निर्णय लिया।
भारतीय पहचान बनाए रखने के लिए उन्होंने अपने नाम के साथ ‘हिंदी’ शब्द जोड़ा और ईरानी अभिलेखों में आज भी ‘मुसावी हिंदी’ नाम दर्ज है। उन्होंने ईरान में घर खरीदा और शादी कर तीन बेटियों और एक बेटे के पिता बने। उनके वंशजों में आगे चलकर रूहोल्लाह खुमैनी का जन्म हुआ।
मुसावी परिवार शिया इस्लाम के सातवें इमाम, इमाम मूसा अल-काज़िम के वंशज माने जाते थे और धार्मिक नेतृत्व के लिए सम्मानित थे। 1869 में सैयद अहमद मुसावी का कर्बला में निधन हो गया, लेकिन उनकी विचारधारा उनके वंशजों को प्रभावित करती रही।
ईरान की इस्लामिक क्रांति और खुमैनी
1979 में रूहोल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में ईरान में क्रांति हुई, जिसने शाह की सत्ता समाप्त कर देश को इस्लामी गणराज्य में बदल दिया। इसके बाद खुमैनी ईरान के सर्वोच्च नेता बने। खुमैनी ने सर्वोच्च पद पर रहने के बावजूद साधारण जीवन बिताया और सार्वजनिक धन का निजी उपयोग करने से मना किया।
अयातुल्ला अली खामेनेई का उदय
अयातुल्ला अली खामेनेई का जन्म 17 जुलाई 1939 को मशहद में हुआ। वे खुमैनी के विचारों से प्रभावित होकर क्रांति में शामिल हुए और उनके करीबी सहयोगी बने। 1989 में खुमैनी की मृत्यु के बाद खामेनेई ईरान के सुप्रीम लीडर बने। हालांकि उनका भारत से सीधा संबंध नहीं रहा, लेकिन उनके गुरु के पूर्वजों का बाराबंकी से जुड़ाव ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
किंटूर गांव की ऐतिहासिक पहचान
बाराबंकी का किंटूर गांव छोटा होने के बावजूद ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां से सैयद अहमद मुसावी ईरान पहुंचे और उनकी विचारधारा ने ईरान के इतिहास को प्रभावित किया। गांव के कुछ शिया परिवार आज भी अपने पूर्वजों के ईरान से संबंध का उल्लेख करते हैं। 70 वर्षीय सैयद निहाल काजमी का दावा है कि उनके परदादा मुफ्ती मोहम्मद कुली मुसावी और सैयद अहमद मुसावी चचेरे भाई थे।
इस तरह बाराबंकी के किंटूर गांव का नाम ईरान की राजनीति और धार्मिक इतिहास से जुड़कर ऐतिहासिक महत्व रखता है, जो भारत और ईरान के बीच लंबे समय से चले आ रहे सांस्कृतिक और धार्मिक संबंधों की याद दिलाता है।