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allahabad high court married woman right to live with partner personal freedom judgment
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई करते हुए एक विवाहित महिला को अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने की स्वतंत्रता दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई बालिग महिला अपनी इच्छा से किसी व्यक्ति के साथ रहना चाहती है और वह किसी गैरकानूनी हिरासत में नहीं है, तो केवल वैवाहिक विवाद के आधार पर उसे पति के साथ रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट का यह रुख वयस्क व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अपनी जिंदगी के बारे में स्वयं निर्णय लेने के अधिकार को रेखांकित करता है।
मामला बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से जुड़ा था। याचिकाकर्ता बलराम ने कोर्ट में अपनी पत्नी और बेटी को पेश करने की मांग की थी। उसका कहना था कि वह अपनी पत्नी के साथ रहना चाहता है और परिवार के रूप में साथ रहने की इच्छा रखता है। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति संदीप जैन की एकलपीठ ने की।
पत्नी ने पति के साथ रहने से किया इनकार
सुनवाई के दौरान महिला ने कोर्ट के सामने अपनी इच्छा स्पष्ट रूप से रखी। उसने बताया कि वैवाहिक जीवन के दौरान उसे कथित तौर पर क्रूरता और उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। इसी वजह से वह अपने पति के साथ नहीं रहना चाहती।
महिला ने अदालत के सामने कहा कि वह किसी की गैरकानूनी हिरासत में नहीं है, बल्कि अपनी इच्छा से अपने पसंद के व्यक्ति के साथ रह रही है। उसने पति के साथ वापस जाने से भी इनकार कर दिया।
दंपती के चार बच्चे, सबसे छोटी बेटी मां के साथ
याचिकाकर्ता बलराम ने कोर्ट को बताया कि दंपती की चार संतानें हैं। इनमें से तीन बच्चे उसके पास हैं, जबकि सबसे छोटी बेटी आर्या अपनी मां के साथ रह रही है। बलराम ने पत्नी के साथ दोबारा रहने की इच्छा जताई, लेकिन महिला इसके लिए तैयार नहीं हुई।
कोर्ट ने दोनों पक्षों की बात सुनने के बाद माना कि पति-पत्नी के बीच गंभीर वैवाहिक विवाद है। ऐसी स्थिति में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के माध्यम से महिला को उसके पति के साथ रहने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
बच्चे के हित को भी कोर्ट ने माना महत्वपूर्ण
अदालत ने करीब दो साल की बच्ची के हित को भी ध्यान में रखा। कोर्ट ने कहा कि इतनी छोटी बच्ची के हित को देखते हुए उसका अपनी मां के पास रहना उचित है। इस आधार पर महिला और उसकी छोटी बेटी को साथ रहने की स्वतंत्रता दी गई।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर कोर्ट का जोर
इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अदालत ने वयस्क महिला की इच्छा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्राथमिकता दी। अदालत ने माना कि विवाह के भीतर गंभीर विवाद होने की स्थिति में भी किसी बालिग व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी संबंध में रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट भी कई मामलों में यह स्पष्ट कर चुका है कि बालिग व्यक्ति को अपनी पसंद से जीवन जीने और अपनी इच्छा के व्यक्ति के साथ रहने का अधिकार है। इलाहाबाद हाईकोर्ट का मौजूदा आदेश भी इसी व्यक्तिगत स्वतंत्रता के सिद्धांत को मजबूती देता है।
बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज
सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने बलराम की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट के आदेश का मूल संदेश यह है कि किसी वयस्क महिला की स्वतंत्र इच्छा को केवल पति के दावे या वैवाहिक संबंध के आधार पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
यह फैसला वैवाहिक विवादों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता, महिला की पसंद और बच्चे के सर्वोत्तम हित के बीच संतुलन का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है।