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amit jogi jaggi murder case supreme court surrender deadline
रायपुर: 23 साल पुराने बहुचर्चित राम अवतार जग्गी हत्याकांड में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट द्वारा अमित जोगी के खिलाफ सुनाया गया फैसला अब राजनीतिक और न्यायिक गलियारों में हलचल मचा रहा है। इस मामले में सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में अमित जोगी की अपील पर सुनवाई हुई, जिसमें उन्हें तत्काल कोई राहत नहीं मिली। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अगली सुनवाई की तारीख 20 अप्रैल 2026 तय की है।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डिविजन बेंच ने निचली अदालत के 31 मई 2007 के फैसले को पलटते हुए अमित जोगी को दोषी ठहराया। अदालत ने पाया कि उपलब्ध सभी सबूत अमित जोगी की संलिप्तता को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं और उन्हें अन्य सह-आरोपियों की तरह सजा दी जानी चाहिए थी।
इस निर्णय के तहत अमित जोगी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है। साथ ही उन्हें 1,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है। जुर्माना न चुकाने पर अतिरिक्त छह माह का सश्रम कारावास भुगतना होगा। अदालत ने अमित जोगी को तीन सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया, यानी 17 अप्रैल तक उन्हें हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार सरेंडर करना होगा।
अमित जोगी ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। सोमवार को हुई सुनवाई में कोर्ट ने उनकी याचिका पर फिलहाल कोई राहत नहीं दी, लेकिन कहा कि वे अपने फैसले के खिलाफ अगली सुनवाई में दलील रख सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 20 अप्रैल 2026 तय की है।
आज क्या हुआ सुप्रीम कोर्ट में
सर्वोच्च न्यायालय ने अमित अजीत जोगी के मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के दो फैसलों को एक साथ जोड़ा और 20 अप्रैल 2026 को संयुक्त सुनवाई करने का आदेश दिया। सुनवाई न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संजीव मेहता की पीठ के समक्ष हुई। अमित जोगी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, मुकुल रोहतगी, विवेक तन्खा और सिद्धार्थ दवे पेश हुए।
अधिवक्ताओं ने कोर्ट को बताया कि हाईकोर्ट के दोनों फैसलों में अमित जोगी को अपनी बात रखने का मौका नहीं दिया गया, जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने 6 नवंबर 2025 को स्पष्ट आदेश दिया था कि उन्हें सुनवाई का अवसर मिलना चाहिए। हाईकोर्ट का 2 अप्रैल 2026 का फैसला बिना अमित जोगी को सुने पारित किया गया और उसी दिन सुबह इसे हाईकोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड कर दिया गया।
सर्वोच्च न्यायालय ने अमित जोगी को निर्देश दिया कि वे 20 अप्रैल 2026 से पहले अपील दायर करें, ताकि सभी मामलों की एक साथ अंतिम सुनवाई की जा सके। अमित जोगी ने सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश का स्वागत करते हुए भरोसा जताया कि उनके साथ हुए अन्याय को कोर्ट सुधारेंगे।
17 अप्रैल तक करना होगा सरेंडर?
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 2 अप्रैल को अमित जोगी को उम्रकैद की सजा सुनाते हुए तीन हफ्ते के भीतर सरेंडर करने का आदेश दिया था। हाईकोर्ट द्वारा दी गई यह मियाद 17 अप्रैल को खत्म हो रही है। यदि 17 अप्रैल से पहले सुप्रीम कोर्ट सजा पर रोक नहीं लगाता है, तो अमित जोगी को कानूनन आत्मसमर्पण करना ही पड़ेगा।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में सुनाई आजीवन कारावास की सजा
(Amit Jogi Convicted) छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 2003 के चर्चित राम अवतार जग्गी हत्याकांड में एक बार फिर सनसनीखेज फैसला सुनाया है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार वर्मा की खंडपीठ ने सीबीआई की अपील (ACQA No. 66/2026) को स्वीकार कर लिया। ट्रायल कोर्ट द्वारा अमित जोगी (तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी के पुत्र) को बरी किए जाने के फैसले को पलट दिया गया। अमित जोगी को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या) के साथ धारा 120-बी (आपराधिक षड्यंत्र) के तहत दोषी ठहराया गया और आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। साथ ही 1,000 रुपये जुर्माना लगाया गया, जिसके डिफॉल्ट में अतिरिक्त छह माह की सश्रम कारावास की सजा दी गई।
(Ram Avtar Jaggi Murder Case) यह फैसला 31 मई 2007 के ट्रायल कोर्ट के फैसले को पूरी तरह बदल देता है। उस समय स्पेशल जज (अट्रोसिटी) रायपुर ने अमित जोगी को बरी कर दिया था, जबकि चिमन सिंह, याह्या ढेबर, अभय गोयल और फिरोज सिद्दीकी समेत अन्य 28 आरोपियों को सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने साफ कहा कि "एक ही साक्ष्य के आधार पर कुछ आरोपियों को दोषी ठहराया जाना और मुख्य साजिशकर्ता को बरी कर दिया जाना कानूनी रूप से असंगत और गलत है।
केस की पृष्ठभूमिः
(Chhattisgarh High Court Verdict) राजनीतिक षड्यंत्र की कहानी 4 जून 2003 की रात करीब 11:40 बजे रायपुर में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के नेता राम अवतार जग्गी को उनकी कार (CG-04-B-2111) में गोली मार दी गई। वे एनसीपी की बड़ी रैली (10 जून 2003) की तैयारी कर रहे थे, जिसे अजीत जोगी सरकार के लिए राजनीतिक खतरा माना जा रहा था। प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) पहले धारा 447-307 के तहत दर्ज हुई, फिर धारा 302 जोड़ी गई। शुरू में राज्य पुलिस ने पांच आरोपियों को गिरफ्तार कर चार्जशीट दाखिल की, लेकिन आगे जांच में भारी गड़बड़ी सामने आई।
(Amit Jogi Life Imprisonment) राज्य सरकार के निर्देश पर केस सीबीआई को सौंप दिया गया। सीबीआई ने 22 जनवरी 2004 को RC 1/5/2004 दर्ज किया और पूरक चार्जशीट दाखिल कर कुल 31 आरोपियों को नामजद किया। मुकदमा सेशन ट्रायल नंबर 329/2005 में चला। सीबीआई का आरोप था कि हत्या राजनीतिक कारणों से की गई। अमित जोगी मुख्य साजिशकर्ता थे। उन्होंने चीमन सिंह को हत्यारा बनाया, जबकि याह्या ढेबर, अभय गोयल और फिरोज सिद्दीकी ने पूरी योजना में हिस्सा लिया। राज्य पुलिस द्वारा पांच 'नकली' आरोपियों को फंसाकर जांच को भटकाने की। भी रची गई।
(Ram Avtar Jaggi murder case history) राज्य सरकार के निर्देश पर केस सीबीआई को सौंप दिया गया। सीबीआई ने 22 जनवरी 2004 को RC 1/5/2004 दर्ज किया और पूरक चार्जशीट दाखिल कर कुल 31 आरोपियों को नामजद किया। मुकदमा सेशन ट्रायल नंबर 329/2005 में चला। सीबीआई का आरोप था कि हत्या राजनीतिक कारणों से की गई। अमित जोगी मुख्य साजिशकर्ता थे। उन्होंने चीमन सिंह को हत्यारा बनाया, जबकि याह्या ढेबर, अभय गोयल और फिरोज सिद्दीकी ने पूरी योजना में हिस्सा लिया। राज्य पुलिस द्वारा पांच 'नकली' आरोपियों को फंसाकर जांच को भटकाने की साजिश भी रची गई।
(Justice Ramesh Sinha Amit Jogi judgment) ट्रायल कोर्ट ने 31 मई 2007 को अमित जोगी को बरी कर दिया, लेकिन बाकी आरोपियों को दोषी ठहराया। चीमन सिंह समेत चार मुख्य हत्यारों को उम्रकैद, अन्य सहयोगियों को भी सजा दी गई। सीबीआई और शिकायतकर्ता सतीश जग्गी (मृतक के पुत्र) ने हाईकोर्ट में अपील दायर की। CRR 434/2007 और CRR 232/2008 में सजा बढ़ाने की मांग भी की गई।
हाईकोर्ट की सुनवाई
( Ram Avtar Jaggi Murder Case) 2 अप्रैल 2026 को सुनवाई पूरी हुई। सीबीआई की ओर से वकील वैभव ए. गोवर्धन, राज्य की ओर से डिप्टी एडवोकेट जनरल डॉ. सौरभ कुमार पांडे और शिकायतकर्ता की ओर से श्री सिंह, राज बहादुर सिंह व अरुणिमा नायर ने दलीलें दीं। अमित जोगी की ओर से विकास वालिया ने बहस की।
(Chhattisgarh High Court Verdict) हाईकोर्ट ने 78 पेज के फैसले में कहा कि "एक ही साक्ष्यों पर आधारित मुकदमे में मुख्य आरोपी को बरी करना असंगत है।" कोर्ट ने रेजिनाल्ड जेरेमिया (PW-85) की गवाही को सबसे मजबूत माना। उन्होंने स्टूडेंट लाइफ से अमित जोगी को जानते थे। 21 मई 2003 को ग्रीन पार्क होटल में हुई बैठक में अमित जोगी ने एनसीपी रैली को नाकाम करने और राम अवतार जग्गी समेत नेताओं को खत्म करने का प्लान बताया। चिमन सिंह को काम सौंपा गया। PW-85 ने अमित जोगी, रोहित प्रसाद, याह्या धेबर, अभय गोयल आदि की मौजूदगी बताई।
( Amit Jogi Life Imprisonment) कोर्ट ने सिद्धार्थ असाती (PW-97), राज सिंह (PW-100) और अन्य गवाहों की गवाही पर जोर दिया। मोबाइल कॉल डिटेल्स, होटल रिकॉर्ड, CM हाउस विजिटर रजिस्टर, बैटरा हाउस में ठहरने और फंड ट्रांसफर के सबूतों को पर्याप्त माना। कोर्ट ने कहा कि अमित जोगी मुख्य साजिशकर्ता थे। वे तत्कालीन CM के पुत्र थे, इसलिए पुलिस मशीनरी को प्रभावित कर नकली आरोपियों को फंसवा सके। ट्रायल कोर्ट ने बिना ठोस आधार के अमित जोगी और अन्य आरोपियों के बीच कृत्रिम भेद किया, जो गलत है।
हाईकोर्ट ने साफ लिखाः "साक्ष्य की समानता होने पर मुख्य आरोपी को बरी करना न्याय की प्रक्रिया को कमजोर करता है।" ट्रायल कोर्ट का फैसला 'परिवर्तनशील, गलत और साक्ष्यों के विपरीत' पाया गया।
अमित जोगी को सजाः तीन हफ्ते में सरेंडर
अमित जोगी वर्तमान में जमानत पर हैं। कोर्ट ने उनके जमानत बांड को तीन हफ्ते तक जारी रखा। इस दौरान उन्हें ट्रायल कोर्ट में सरेंडर करना होगा। अगर नहीं किया तो ट्रायल कोर्ट उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेजेगा। रजिस्ट्री को फैसले की कॉपी अमित जोगी को भेजने और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का अधिकार बताने का निर्देश दिया गया।
CRR 434/2007 (शिकायतकर्ता की अपील) को निस्तारित कर दिया गया। सजा बढ़ाने वाली CRR 232/2008 को इसलिए खारिज कर दिया गया क्योंकि अन्य आरोपियों की सजा पहले ही हाईकोर्ट ने 4 अप्रैल 2024 के फैसले में पुष्टि कर दी थी।
यह केस छत्तीसगढ़ की राजनीति में लंबे समय से चर्चा में रहा। अजीत जोगी परिवार और एनसीपी के बीच तनाव, रैली को नाकाम करने का मकसद और पुलिस जांच में कथित हस्तक्षेप सब कुछ इस फैसले में उजागर हुआ। फैसले में कहा गया कि “सत्ता का दुरुपयोग कर न्याय की राह रोकी नहीं जा सकती।"
अमित जोगी की ओर से सुप्रीम कोर्ट में SLP (Crl.) No. 5776/2026 दायर की गई है, जो 6 अप्रैल 2026 को कोर्ट नंबर 2 (न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता) के समक्ष लिस्टेड है। इसमें हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई है।
वकीलों की प्रतिक्रिया
सीबीआई वकील वैभव गोवर्धन ने कहा, "न्याय की जीत हुई। साक्ष्य स्पष्ट थे।" शिकायतकर्ता सतीश जग्गी के वकील श्री सिंह ने इसे "परिवार के लिए राहत" बताया। अमित जोगी की ओर से विकास वालिया ने कहा कि फैसले पर सुप्रीम कोर्ट में अपील की जाएगी।
केस की समयरेखा
4 जून 2003: तारू जग्गी की हत्या
जनवरी 2004: सीबीआई जांच शुरू
31 मई 2007: ट्रायल कोर्ट फैसला (अमित जोगी बरी)
2007-2008: सीबीआई और सतीश जग्गी की
अपील
2 अप्रैल 2026: हाईकोर्ट फैसला अमित जोगी दोषी
यह फैसला न केवल जग्गी परिवार को न्याय दिलाता है, बल्कि राजनीतिक हत्याओं में साक्ष्य की समानता और मुख्य साजिशकर्ता की जिम्मेदारी पर नया मिसाल कायम करता है। अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट पर है, जहां अमित जोगी की SLP पर आज 6 अप्रैल को सुनवाई होगी।
रामावतार जग्गी कौन थे?
(Ram Avtar Jaggi murder case history) रामावतार जग्गी एक प्रमुख कारोबारी और दिग्गज राजनेता विद्याचरण शुक्ल के अत्यंत भरोसेमंद साथी थे। जब शुक्ल ने कांग्रेस छोड़ी, तब जग्गी भी उनके साथ राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) में शामिल हो गए, जहाँ उन्हें छत्तीसगढ़ राज्य का कोषाध्यक्ष नियुक्त किया गया था।
हत्याकांड में 28 लोग पाए गए दोषी
जग्गी हत्याकांड में अभय गोयल, याहया ढेबर, वीके पांडे, फिरोज सिद्दीकी, राकेश चंद्र त्रिवेदी, अवनीश सिंह लल्लन, सूर्यकांत तिवारी, अमरीक सिंह गिल, चिमन सिंह, सुनील गुप्ता, राजू भदौरिया, अनिल पचौरी, रविंद्र सिंह, रवि सिंह, लल्ला भदौरिया, धर्मेंद्र, सत्येंद्र सिंह, शिवेंद्र सिंह परिहार, विनोद सिंह राठौर, संजय सिंह कुशवाहा, राकेश कुमार शर्मा, (मृत) विक्रम शर्मा, जबवंत, विश्वनाथ राजभर दोषी पाए गए थे।
पुलिस अधिकारियों की संलिप्तता
न्यायपालिका ने न केवल अपराधियों बल्कि कानून के रखवालों को भी सजा सुनाई। सजा पाने वालों में दो तत्कालीन सीएसपी (CSP) और एक थाना प्रभारी शामिल थे, जो इस साजिश का हिस्सा पाए गए।