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रायपुर। छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध लोक कलाकार, संस्कृतिकर्मी और पद्मश्री सम्मानित अनूप रंजन पांडेय को गुरुवार को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया। नई दिल्ली में आयोजित सम्मान समारोह में राष्ट्रपति ने देश के अलग-अलग राज्यों से आए कलाकारों को सम्मानित किया। यह सम्मान छत्तीसगढ़ की लोक कला, लोक रंगमंच और आदिवासी संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन के क्षेत्र में पांडेय के लंबे योगदान की पहचान है।
सम्मान प्राप्त करने के बाद अनूप रंजन पांडेय ने कहा कि यह पुरस्कार उनके लिए व्यक्तिगत सम्मान से कहीं बढ़कर है। उन्होंने इसे छत्तीसगढ़ के आदिवासी कलाकारों और प्रदेश की जनता को समर्पित किया। उन्होंने कहा कि प्रदेश की लोक संस्कृति और पारंपरिक कलाकारों की मेहनत ने उनकी सांस्कृतिक यात्रा को दिशा दी है।
राष्ट्रपति ने लोक और जनजातीय कलाओं के महत्व को बताया
समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने सम्मानित कलाकारों के योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि ये कलाकार मिलकर भारत का ऐसा सांस्कृतिक मानचित्र प्रस्तुत करते हैं, जिसमें देश की मिट्टी की कहानियां, गीत, नृत्य, उत्सव, भाषाएं और बोलियां समाहित हैं।
राष्ट्रपति ने कहा कि भारत की विभिन्न कला शैलियों के संरक्षण में गुरु-शिष्य परंपरा की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने कहा कि हमारी कलाओं की सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक जीवंत गुरु होते हैं। बदलते समय में कई लोक कलाओं के सामने विलुप्त होने का खतरा है। इसलिए केवल इन कलाओं का दस्तावेजीकरण ही नहीं, बल्कि उन्हें जीवंत बनाए रखने के लिए भी विशेष प्रयास आवश्यक हैं।
उन्होंने लोक और जनजातीय कलाओं को प्रकृति, समुदाय और सामूहिक चेतना से जोड़ते हुए कहा कि इन कला रूपों में जीवन का स्वाभाविक उल्लास और प्रकृति के साथ गहरा संवाद दिखाई देता है। यही कारण है कि लोक कलाएं भारत की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण आधार हैं।
चार दशक से लोक संस्कृति की साधना
21 जुलाई 1965 को बिलासपुर में जन्मे और जांजगीर-चांपा जिले के ग्राम कोसा से जुड़े अनूप रंजन पांडेय पिछले चार दशकों से अधिक समय से लोक संगीत, अभिनय, निर्देशन और लोक संस्कृति के संरक्षण के क्षेत्र में सक्रिय हैं।
उनकी प्रारंभिक संगीत, साहित्य और संस्कृति की शिक्षा परिवार से मिली। उनकी माता एवं गुरु स्व. मनोरमा पांडेय भजन गायिका थीं, जबकि उनके पिता स्व. राधेश्याम पांडेय शिक्षाविद और संस्कृत के विद्वान थे। परिवार से मिले संस्कारों ने उनकी सांस्कृतिक यात्रा की नींव तैयार की।
लोकनाट्य नाचा और कृष्ण की बाल लीलाओं पर आधारित रहस लोकनाट्य से प्रभावित होकर उन्होंने महज नौ वर्ष की उम्र में रेलवे स्कूल, बिलासपुर के मंच पर अपनी पहली औपचारिक प्रस्तुति दी। इस प्रस्तुति में उन्होंने ‘तृण’ की भूमिका निभाई थी।
हबीब तनवीर के साथ काम करने का मिला अवसर
अनूप रंजन पांडेय के सांस्कृतिक जीवन में वरिष्ठ रंगकर्मी और पद्मभूषण हबीब तनवीर का सानिध्य एक महत्वपूर्ण पड़ाव रहा। वर्ष 1988-89 के दौरान उन्हें हबीब तनवीर के निर्देशन में ‘नया थिएटर’ के साथ काम करने का अवसर मिला।
उन्होंने हबीब तनवीर के निर्देशन में ‘चरणदास चोर’, ‘मिट्टी की गाड़ी’, ‘आगरा बाजार’, ‘मुद्राराक्षस’, ‘मोर नाव दमाद गाँव के नाव ससुरार’, ‘सड़क’, ‘कामदेव का अपना बसंत ऋतु का सपना’, ‘राजरक्त’, ‘वेणीसंहार’ और ‘जिस लाहौर देख्या नई जन्मयाई नई’ जैसे चर्चित नाटकों में अभिनय किया।
इन नाट्य प्रस्तुतियों के सिलसिले में उन्होंने देश के अलावा विदेशों की भी यात्राएं कीं। वर्ष 1993 में वे लंदन, लेसेस्टर और ग्लासगो गए, जबकि वर्ष 2006 में जर्मनी के फ्रैंकफर्ट, बर्लिन और बॉन में भी प्रस्तुतियां दीं।
साक्षरता अभियान से शुरू हुआ जनजागरण का दौर
1990 का दशक पांडेय के सांस्कृतिक जीवन में एक और महत्वपूर्ण पड़ाव लेकर आया। राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के कार्यक्रमों से जुड़कर उन्होंने नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से गांव-गांव जाकर जनजागरूकता अभियान चलाया।
महिला सशक्तीकरण, पर्यावरण संरक्षण, जनस्वास्थ्य और साक्षरता जैसे विषयों पर उन्होंने 3,000 से अधिक नुक्कड़ नाटकों में भागीदारी की। इस दौरान लोक कला को केवल मनोरंजन का माध्यम न बनाकर सामाजिक बदलाव और जागरूकता का माध्यम बनाने की दिशा में भी उन्होंने काम किया।
लोक संपदा के संरक्षण में बड़ा योगदान
लोक रंगमंच से जुड़े रहते हुए पांडेय ने छत्तीसगढ़ की मौखिक एवं वाचिक परंपराओं को संरक्षित करने का व्यापक काम किया। उन्होंने लोकगीत, लोकगाथा, लोकवार्ता, लोक आख्यान, लोकनाट्य और लोकवाद्यों का संग्रह और दस्तावेजीकरण किया।
उन्होंने छत्तीसगढ़ अंचल के 2,500 लोकगीत, गाथा और वार्ताओं, 150 लोकनाट्य नाचा के नकल-प्रहसनों और 175 लोकवाद्यों का संकलन किया। इनका विभिन्न स्थानों पर प्रदर्शन भी किया गया।
छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद उन्होंने 80 लोकवाद्य महंत घासीदास संग्रहालय, संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ़ शासन को उपलब्ध कराए। इसके अलावा मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय, भोपाल के लिए देशभर से 200 सुषिर लोकवाद्यों का संग्रह किया। इन वाद्यों को गंधर्व लोकरंग आयोजन में प्रदर्शित किया गया और वर्तमान में ये त्रिवेणी संग्रहालय, उज्जैन में प्रदर्शित हैं।
‘बस्तर बैंड’ ने दिया ‘बंदूक छोड़ो, ढोल पकड़ो’ का संदेश
अनूप रंजन पांडेय के सांस्कृतिक कार्यों में ‘बस्तर बैंड’ का विशेष स्थान है। लगभग डेढ़ दशक पहले उन्होंने बस्तर के आदिवासी कलाकारों के साथ मिलकर बस्तर बैंड की स्थापना की।
बस्तर क्षेत्र के 70 से अधिक पारंपरिक, प्रचलित और दुर्लभ लोकवाद्यों को एक मंच पर लाकर उन्होंने कई प्रस्तुतियां तैयार कीं। हिंसा से प्रभावित बस्तर में लोक कला और संगीत को शांति तथा रचनात्मकता का माध्यम बनाने के उद्देश्य से ‘बंदूक छोड़ो... ढोल पकड़ो’ अभियान चलाया गया।
इस अभियान के जरिए युवाओं को रचनात्मक गतिविधियों से जोड़ने के साथ लोकवाद्य, लोकगीत, लोकगाथा, मिथक कथाओं और आदिवासी कला-संस्कृति के संरक्षण का प्रयास किया गया।
बताया गया है कि इस पहल के माध्यम से बिखराव का सामना कर रही 100 से अधिक कला मंडलियों को पुनर्गठित किया गया और 5,000 से अधिक कलाकारों को सक्रिय किया गया। बस्तर बैंड से जुड़े 11 कलाकारों को अब तक राष्ट्रीय और राज्य स्तर के पुरस्कार भी मिल चुके हैं।
देश-विदेश में बस्तर की संस्कृति की पहचान
बस्तर बैंड और इसके कलाकारों ने देश के विभिन्न प्रतिष्ठित महोत्सवों और मंचों पर प्रस्तुतियां दी हैं। राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यपाल, केंद्रीय मंत्रियों, कूटनीतिज्ञों और विभिन्न राज्यों के जनप्रतिनिधियों के सामने भी बस्तर की लोक संस्कृति को प्रस्तुत किया गया है।
इसके अलावा बस्तर बैंड ने रूस, नाइजीरिया, दक्षिण अफ्रीका और इटली सहित विभिन्न देशों में भी अपनी प्रस्तुतियां दी हैं। इन अंतरराष्ट्रीय मंचों के माध्यम से बस्तर की पारंपरिक लोक संस्कृति को वैश्विक पहचान मिली।
साहित्य और शोध के क्षेत्र में भी सक्रिय
अनूप रंजन पांडेय ने साहित्य और शोध के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण काम किया है। उन्होंने सतत शिक्षा कार्यक्रम के लिए मानव संसाधन मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा समर्थित राज्य संसाधन केंद्र के माध्यम से तैयार 114 नवपाठक साहित्य के संपादन में योगदान दिया।
उन्होंने गोंड-परधान चित्रकारी पर केंद्रित ‘करम देव’ और ‘भगवान का धरती से गायब हो जाना’ जैसी पुस्तकों का भी संपादन किया।
वर्ष 2015 में उन्होंने इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ से लोक कला विषय में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की।
पद्मश्री समेत मिल चुके हैं कई सम्मान
अनूप रंजन पांडेय को उनकी दीर्घकालीन सांस्कृतिक साधना के लिए अनेक प्रतिष्ठित सम्मान मिल चुके हैं। इनमें वर्ष 2014 का दाऊ मंदराजी लोक कला सम्मान, राष्ट्रीय स्वयं सिद्धश्री सम्मान-2017, वरिष्ठ अध्येतावृत्ति सम्मान-2016 और टैगोर नेशनल स्कॉलरशिप 2019-20 प्रमुख हैं।
भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 2019 में देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मश्री से सम्मानित किया था। इसके अलावा उन्हें राष्ट्रीय तुलसी सम्मान, मध्यप्रदेश, लोक कला सम्मान, भिलाई इस्पात संयंत्र तथा छत्तीसगढ़ शासन के विभिन्न राज्य अलंकरणों से भी सम्मानित किया जा चुका है।
संगीत नाटक अकादमी से भी रहा पुराना जुड़ाव
अनूप रंजन पांडेय संगीत नाटक अकादमी, नई दिल्ली की जनरल कौंसिल में तीन कार्यकालों तक सदस्य रह चुके हैं। उन्होंने वर्ष 2004, 2009 और 2014 में अकादमी की जनरल कौंसिल में जिम्मेदारी संभाली।
इसके अलावा वे संस्कृति मंत्रालय की विभिन्न विशेषज्ञ समितियों, जोनल कल्चरल सेंटर नागपुर की प्रोग्राम कमेटी और भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR) की विशेषज्ञ उपसमिति समेत कई राष्ट्रीय स्तर की संस्थाओं में जिम्मेदारियां निभा चुके हैं।
उन्होंने भारत रंग महोत्सव की स्क्रीनिंग कमेटी, विभिन्न रंग महोत्सवों की सलाहकार समितियों और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की छात्र चयन प्रक्रिया में भी भागीदारी की है।
परिवार भी सांस्कृतिक यात्रा का हिस्सा
अनूप रंजन पांडेय की सांस्कृतिक यात्रा में उनका परिवार भी लगातार सहभागी रहा है। उनकी पत्नी और लोककला मर्मज्ञ अस्मिता पांडेय तथा बेटी अनन्या पांडेय भी उनके सांस्कृतिक कार्यों में सहयोग करती हैं।
वर्तमान में अनूप रंजन पांडेय ‘चिन्हारी रंगमंडल’ के निर्देशक और ‘बस्तर बैंड’ के संचालक के रूप में सक्रिय हैं।
संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित होने के साथ उनकी चार दशक से अधिक लंबी सांस्कृतिक यात्रा को एक और महत्वपूर्ण राष्ट्रीय पहचान मिली है। यह सम्मान न केवल उनके व्यक्तिगत योगदान का सम्मान है, बल्कि छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक एवं आदिवासी कला परंपरा के लिए भी गौरव का अवसर माना जा रहा है।