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जगदलपुर। बस्तर पुलिस के चर्चित ई-पेरोल घोटाले ने सिर्फ सरकारी वेतन भुगतान प्रणाली की खामियों को ही उजागर नहीं किया, बल्कि बैंकिंग सिस्टम और आयकर विभाग की निगरानी व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शुरुआती जांच के अनुसार करीब 45 हजार रुपये मासिक वेतन पाने वाले एक आरक्षक ने तीन वर्षों में लगभग 3.40 करोड़ रुपये अपने खाते में ट्रांसफर करा लिए। कई महीनों तक उसके खाते में हर महीने करीब 30 लाख रुपये वेतन के नाम पर पहुंचे, लेकिन न तो ई-पेरोल सिस्टम ने कोई अलर्ट जारी किया और न ही इतनी बड़ी रकम के लेनदेन पर बैंक या अन्य एजेंसियों की ओर से तत्काल कोई कार्रवाई सामने आई।
क्या है पूरा मामला?
ऑडिट में सामने आया कि बस्तर पुलिस कार्यालय में ई-पेरोल प्रणाली की खामियों का फायदा उठाकर कथित रूप से वेतन भुगतान में हेरफेर किया गया। आरोप है कि डिजिटल स्तर पर वेतन पत्रक में बदलाव कर वास्तविक वेतन से कई गुना अधिक राशि संबंधित कर्मचारी के खाते में भेजी जाती रही। जांच के बाद मामले में कार्रवाई शुरू हुई और मुख्य आरोपी सहित अन्य कर्मचारियों को गिरफ्तार किया गया।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि लगभग 45 हजार रुपये मासिक वेतन पाने वाले कर्मचारी के खाते में कई महीनों तक 30-30 लाख रुपये तक वेतन जमा होता रहा, लेकिन यह असामान्य भुगतान किसी भी स्तर पर तुरंत नहीं पकड़ा गया।
बैंकिंग सिस्टम पर भी सवाल
इस मामले के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब किसी सरकारी कर्मचारी के खाते में बार-बार लाखों रुपये का वेतन आया, तो संबंधित बैंक की निगरानी प्रणाली ने इसे संदिग्ध लेनदेन के रूप में क्यों नहीं चिन्हित किया?
बैंकों में सामान्यतः बड़े और असामान्य वित्तीय लेनदेन की निगरानी के लिए आंतरिक सिस्टम होते हैं। इसके अलावा, संदिग्ध लेनदेन की सूचना Financial Intelligence Unit (FIU-IND) को भेजने की व्यवस्था भी होती है। यदि किसी खाते में ग्राहक की सामान्य प्रोफाइल से बिल्कुल अलग बड़े पैमाने पर राशि का आवागमन हो, तो बैंक आवश्यक जांच कर सकता है।
हालांकि, केवल बड़ी राशि का जमा होना अपने आप में हर मामले में आयकर विभाग को तत्काल सूचना भेजने का कानूनी आधार नहीं होता। बैंक मुख्य रूप से नियमानुसार निर्धारित श्रेणियों के संदिग्ध लेनदेन (Suspicious Transaction Reports) या अन्य अनिवार्य रिपोर्टिंग के मामलों में संबंधित एजेंसियों को जानकारी देते हैं। इसलिए यह जांच का विषय है कि इस मामले में बैंक ने लेनदेन को संदिग्ध माना था या नहीं।
विशेषज्ञों के अनुसार, आयकर विभाग तक हर बड़े बैंक ट्रांजेक्शन की स्वतः सूचना नहीं पहुंचती। अलग-अलग प्रकार के वित्तीय लेनदेन के लिए अलग रिपोर्टिंग नियम हैं। लेकिन यदि किसी खाते में लगातार असामान्य और संदिग्ध लेनदेन हो रहे हों, तो नियामकीय प्रावधानों के तहत संबंधित एजेंसियों को रिपोर्ट भेजी जा सकती है।
यही कारण है कि अब यह भी जांच का विषय बन सकता है कि क्या बैंक ने इन लेनदेन को संदिग्ध माना था? यदि माना था तो क्या नियमानुसार रिपोर्ट भेजी गई? यदि नहीं माना गया तो इतनी बड़ी राशि नियमित वेतन के रूप में कैसे स्वीकार होती रही?
क्या KYC और जोखिम मूल्यांकन (Risk Monitoring) प्रणाली प्रभावी ढंग से काम कर रही थी?
ई-पेरोल की चार बड़ी कमजोरियां
ऑडिट रिपोर्ट में जिन प्रमुख कमियों का उल्लेख किया गया है, उनमें शामिल हैं-
असामान्य वेतन भुगतान पर स्वतः अलर्ट सिस्टम का अभाव।
विभिन्न भत्तों की अधिकतम सीमा तय नहीं होना।
डिजिटल हस्ताक्षर के बाद भी दस्तावेजों में बदलाव की संभावना।
बड़े भुगतान पर अलग से सत्यापन या दोहरी मंजूरी की व्यवस्था नहीं होना।
जांच का दायरा बढ़ सकता है
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल वेतन घोटाले तक सीमित नहीं रह सकता। जांच एजेंसियां अब यह भी देख सकती हैं कि इतनी बड़ी राशि खाते में आने के बाद उसका उपयोग कैसे हुआ, रकम कहां-कहां ट्रांसफर हुई और क्या किसी अन्य व्यक्ति या संस्था को इसका लाभ मिला।
यह मामला सरकारी भुगतान प्रणाली, बैंकिंग निगरानी और वित्तीय पारदर्शिता, तीनों व्यवस्थाओं की प्रभावशीलता पर बड़ा सवाल बनकर सामने आया है। यदि जांच में बैंकिंग या नियामकीय स्तर पर भी लापरवाही सामने आती है, तो संबंधित संस्थाओं की भूमिका की भी जांच हो सकती है।