

Copyright © 2026 rights reserved by Inkquest Media
अन्य समाचार

bastar-jagargunda-naxal-free-wedding-news
रायपुर: बस्तर के जंगलों में अब गोलियों की गूँज नहीं, बल्कि शादियों के मंगल गीत सुनाई दे रहे हैं। कभी 'आतंक का टापू' माने जाने वाले सुकमा जिले के जगरगुंडा इलाके में माओवाद का काला साया छंटते ही इंसानी रिश्तों की डोर फिर से मजबूत होने लगी है। नक्सलियों के डर से जो रिश्ते टूट गए थे या थमे हुए थे, वे अब विकास और सुरक्षा के नए दौर में फिर से परवान चढ़ रहे हैं।
नक्सलियों की 'मंजूरी' के बिना नहीं होती थी शादी
एक दौर था जब जगरगुंडा और आसपास के गांवों में अपनी बेटी का ब्याह करने से लोग घबराते थे। यहाँ रिश्ते जोड़ने के लिए परिवार को नक्सलियों के सामने अर्जी लगानी पड़ती थी। शादी होगी या नहीं, यह घर के बड़े नहीं बल्कि नक्सली तय करते थे।
नक्सलियों का दखल इतना था कि वे तय करते थे कि बारात में कितने लोग शामिल होंगे। शादी का कार्यक्रम किस समय संपन्न होगा। बारातियों को गाँव से कब वापस जाना है। हैरानी की बात तो यह थी कि यदि परिवार का कोई सदस्य सरकारी नौकरी में होता, तो उसे अपनी ही बहन या भाई की शादी में आने की अनुमति नहीं थी। लोग डर के मारे अपने सरकारी कर्मचारी रिश्तेदारों को कार्ड तक नहीं भेजते थे।
कामाराम गाँव में 20 साल बाद पहुँची बारात
बदलाव की सबसे सुंदर तस्वीर हाल ही में जगरगुंडा से 10 किलोमीटर दूर कामाराम गाँव में देखने को मिली। वर्ष 2005 के बाद यह पहला मौका था जब इस गाँव में गाड़ियों के काफिले और गाजे-बाजे के साथ दंतेवाड़ा के गोंगपाल से बारात पहुँची।
जब दूल्हा गाड़ियों के साथ गाँव पहुँचा, तो पूरा गाँव इस ऐतिहासिक पल का गवाह बनने के लिए उमड़ पड़ा। दूल्हे के रिश्तेदार प्रेम नाग बताते हैं, “एक समय था जब यहाँ आना मौत को दावत देने जैसा था, लेकिन अब सुरक्षा और विश्वास के माहौल ने हमें अपनों के करीब ला दिया है।”
नक्सलवाद का असर सिर्फ शादियों तक सीमित नहीं था। मौत के गम या बीमारी की स्थिति में भी लोग जगरगुंडा जाने से कतराते थे। हल्बा और आदिवासी समाज समेत अन्य वर्गों के लोग न तो पंडितों से मुहूर्त निकलवा पाते थे और न ही रीति-रिवाजों के साथ अंतिम संस्कार कर पाते थे। इसी घुटन और डर की वजह से इस क्षेत्र से बड़े पैमाने पर पलायन हुआ था।
बस्तर को 'नक्सलमुक्त' बनाने के सरकारी दावों और सुरक्षा बलों की तैनाती के बीच अब फिजा बदल चुकी है। पलायन कर चुके लोग वापस अपने घरों की ओर लौट रहे हैं।
