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भिलाई। भिलाई स्टील प्लांट यानी BSP से कथित लोहा और स्क्रैप चोरी का मामला अब लगातार बड़ा होता जा रहा है। पुलिस की कार्रवाई में जहां प्लांट से जुड़े अधिकारियों और एक भाजपा नेता समेत कई लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है, वहीं वैशाली नगर विधायक रिकेश सेन ने इस पूरे मामले को लेकर बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं।
विधायक का दावा है कि बीएसपी से पिछले करीब 40 वर्षों में लगभग 10 हजार करोड़ रुपये के लोहे की कथित चोरी हुई है। उन्होंने डीजीपी अरुण देव गौतम को लिखे पत्र में आरोप लगाया है कि इस कथित अवैध नेटवर्क से होने वाली कमाई का हिस्सा 4 IPS, 3 IAS और 12 नेताओं तक पहुंचता था। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है और संबंधित अधिकारियों या नेताओं के खिलाफ इन दावों के आधार पर कोई दोष सिद्ध नहीं हुआ है।
विधायक रिकेश सेन लंबे समय से बीएसपी में कथित स्क्रैप चोरी का मुद्दा उठा रहे हैं। जुलाई में उन्होंने विधानसभा में भी इस मामले को उठाते हुए इसे राष्ट्रीय संपत्ति की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय बताया था।
अब डीजीपी को लिखे पत्र में उन्होंने पूरे मामले की गहराई से जांच की मांग की है। उनका कहना है कि जांच केवल उन लोगों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए जो चोरी का माल उठाने या बेचने में सीधे शामिल पाए जा रहे हैं, बल्कि उन कथित बड़े लोगों तक पहुंचना चाहिए जो इस नेटवर्क को संरक्षण देते रहे होंगे।
विधायक ने केंद्रीय एजेंसी से जांच की मांग भी की है। इससे पहले उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भी पत्र भेजा था। इसके बाद SAIL के कॉर्पोरेट विजिलेंस विभाग ने मामले का संज्ञान लेते हुए उनसे ठोस साक्ष्य मांगे थे।
दूसरी तरफ दुर्ग पुलिस की जांच लगातार आगे बढ़ रही है। पुलिस की कार्रवाई में अब तक कई आरोपियों की गिरफ्तारी हुई है। मामले में बीएसपी के दो अधिकारियों—GM हिमांशु भूषण मलिक और AGM मनोज कुमार देवांगन—के नाम सामने आए हैं। पुलिस के अनुसार कथित नेटवर्क में प्लांट के भीतर से सहयोग मिलने और स्क्रैप को बाहर भेजने का एंगल जांच में सामने आया है।
जांच के मुताबिक कथित तौर पर आयरन स्क्रैप को फ्लू डस्ट के साथ मिलाकर प्लांट से बाहर भेजा जाता था। इसके बाद इसे अकलोरडीह स्थित A.K. Traders जैसे ठिकानों पर जमा किए जाने की बात सामने आई है।
पुलिस ने 6 मई 2026 को अकलोरडीह स्थित A.K. Traders और हथखोज में छापेमारी की थी। कार्रवाई में करीब 250 टन लौह स्क्रैप के साथ ट्रक, हाईवा, JCB और हाईड्रा समेत करीब 3.22 करोड़ रुपये का सामान जब्त किए जाने की जानकारी सामने आई है। यानी मामला सिर्फ कागजों या आरोपों तक सीमित नहीं है। पुलिस की कार्रवाई में बड़ी मात्रा में संदिग्ध स्क्रैप और उससे जुड़े वाहन बरामद किए गए हैं।
मामले में भास्कर मुदलियार की गिरफ्तारी ने राजनीतिक हलचल भी बढ़ा दी। मुदलियार वैशाली नगर भाजपा मंडल के कोषाध्यक्ष और स्क्रैप कारोबारी बताए गए हैं। पुलिस के मुताबिक जांच में उनकी भूमिका सामने आने के बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया। पुलिस का दावा है कि उनकी गाड़ियों के बीएसपी परिसर में संचालन और कथित चोरी के स्क्रैप से जुड़े नेटवर्क के संबंध में साक्ष्य मिले। गिरफ्तारी के बाद भाजपा ने भी कार्रवाई करते हुए उन्हें 6 साल के लिए पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निष्कासित कर दिया।
अब सबसे बड़ा सवाल—10 हजार करोड़ के दावे का सच क्या है? यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल है। एक तरफ पुलिस को करोड़ों रुपये का संदिग्ध स्क्रैप और उससे जुड़े वाहन मिल रहे हैं, अधिकारी और कारोबारी गिरफ्तार हो रहे हैं। दूसरी तरफ विधायक पिछले चार दशकों में 10 हजार करोड़ रुपये की कथित चोरी और बड़े अधिकारियों-राजनेताओं तक पैसे पहुंचने का दावा कर रहे हैं। लेकिन इन दोनों बातों के बीच एक बेहद महत्वपूर्ण अंतर है—10 हजार करोड़ रुपये का आंकड़ा अभी विधायक का आरोप/दावा है, पुलिस या किसी स्वतंत्र जांच एजेंसी द्वारा प्रमाणित निष्कर्ष नहीं। इसीलिए अब जांच का असली फोकस सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि स्क्रैप चोरी किसने की।
बल्कि सवाल यह भी है कि चोरी का माल प्लांट से बाहर कैसे निकलता था? किन लोगों की अनुमति या मिलीभगत से यह संभव हुआ? स्क्रैप खरीदने वाले कारोबारियों तक यह माल कैसे पहुंचता था? कितने समय से यह कथित नेटवर्क सक्रिय था? चोरी के माल से जुड़े पैसों का लेन-देन कहां हुआ? और अगर इतने बड़े स्तर पर चोरी हुई, तो जिम्मेदारी तय करने के लिए कौन-कौन से अधिकारी जांच के दायरे में आएंगे? जांच की दिशा अब तय करेगी मामले का असली सच
पुलिस की जांच अभी जारी है और आने वाले दिनों में और गिरफ्तारियां या नए नाम सामने आने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। मीडिया रिपोर्टों में भी पुलिस की ओर से नेटवर्क के और लोगों तक पहुंचने की बात सामने आई है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि जांच किसी राजनीतिक पहचान या पद को देखकर नहीं, बल्कि सबूतों के आधार पर आगे बढ़े। अगर विधायक द्वारा लगाए गए बड़े आरोपों में तथ्य हैं, तो जांच को उन आरोपों की तह तक पहुंचना होगा। और अगर कुछ दावे तथ्यहीन हैं, तो जांच के जरिए उनकी भी स्थिति साफ होनी चाहिए।
क्योंकि मामला सिर्फ करोड़ों के स्क्रैप का नहीं है। भिलाई स्टील प्लांट देश की महत्वपूर्ण सार्वजनिक क्षेत्र की औद्योगिक संपत्तियों में से एक है। ऐसे में अगर लंबे समय से संगठित चोरी के आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल चोरी का मामला नहीं, बल्कि सिस्टम की निगरानी और जवाबदेही पर भी बड़ा सवाल होगा।फिलहाल पुलिस की कार्रवाई जारी है और सबकी नजर इस बात पर है कि जांच अगली परत में किन नामों तक पहुंचती है।