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बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने सहायक प्राध्यापक भर्ती प्रक्रिया 2019 को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया है। जस्टिस संजय एस. अग्रवाल और जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की बेंच ने 59 पृष्ठों के विस्तृत फैसले में कहा कि छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग द्वारा भर्ती नियमों में किए गए संशोधन और उसके आधार पर जारी चयन सूचियां पूरी तरह संवैधानिक और वैध हैं। फैसले में स्पष्ट किया गया कि यदि आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार सामान्य वर्ग के कट-ऑफ से अधिक अंक प्राप्त करता है, तो उसे अनारक्षित श्रेणी में गिना जाएगा।
माखन लाल बघेल और अन्य उम्मीदवारों ने 19 मार्च 2021 को नियमों में किए गए तृतीय संशोधन (खंड 17.6) को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि लिखित परीक्षा के बाद नियम बदलना "खेल के बीच में नियम बदलने" के समान है। उन्होंने विशेष रूप से दिव्यांग वर्ग के लिए लागू क्षैतिज आरक्षण के क्रियान्वयन पर सवाल उठाए थे। हाई कोर्ट ने राजेश कुमार डारिया मामले का हवाला देते हुए ‘इंटरलॉकिंग सिद्धांत’ को स्पष्ट किया और कहा कि क्षैतिज आरक्षण वर्टिकल श्रेणियों में कटौती करते हुए लागू होता है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि जो उम्मीदवार पूरी प्रक्रिया में शामिल हुए और सफल नहीं हो सके, वे परिणाम के पक्ष में न आने पर भर्ती प्रक्रिया को चुनौती नहीं दे सकते। खंड 17.6 से कोई नया नियम नहीं लागू किया गया, बल्कि यह केवल आरक्षण और रिक्तियों को आगे बढ़ाने के तरीके को स्पष्ट करता है।
इस फैसले से वर्ष 2021 में केमिस्ट्री, कॉमर्स और फिजिक्स जैसे विषयों के लिए चयनित उम्मीदवारों को राहत मिली है। हाई कोर्ट ने 21 जनवरी 2022 को जारी नियुक्ति आदेशों को भी सही माना। इस निर्णय से प्रदेश के सरकारी कॉलेजों में कार्यरत सैकड़ों सहायक प्राध्यापकों को कानूनी सुरक्षा और राहत मिली है।