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chhattisgarh government printing press samvad orders ignored printing work controversy
रायपुर, 20 अगस्त 2026। छत्तीसगढ़ में सरकारी विभागों के मुद्रण और प्रचार-प्रसार से जुड़े कामों को लेकर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं। प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, मुख्य सचिव, वित्त सचिव और सामान्य प्रशासन विभाग की ओर से समय-समय पर जारी निर्देशों के बावजूद कुछ सरकारी विभागों में पुस्तकों, प्रचार सामग्री और अन्य मुद्रण कार्यों को सरकारी मुद्रणालय के बजाय अन्य माध्यमों से कराने का मामला सामने आया है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि शासन के स्पष्ट निर्देशों के बाद भी व्यवस्था में अपेक्षित बदलाव नहीं आया है।
मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकारी विभागों की ओर से होने वाले मुद्रण कार्य में बड़ी राशि खर्च होती है। रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश के सरकारी विभागों से हर वर्ष करीब 400 करोड़ रुपये के आसपास का मुद्रण कार्य कराया जाता है। ऐसे में इस व्यवस्था में पारदर्शिता, गुणवत्ता और निर्धारित प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
2001, 2018 और 2019 के निर्देशों का हवाला
रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2001, 2018 और 2019 में मुख्य सचिव स्तर से शासन के विभिन्न विभागों, उपक्रमों, निगमों, मंडलों, विश्वविद्यालयों, आयोगों और अर्द्धशासकीय संस्थाओं को प्रकाशन और प्रचार-प्रसार संबंधी कार्य निर्धारित व्यवस्था के तहत कराने के निर्देश दिए गए थे।
इसके बाद पिछले वर्ष वित्त सचिव मुकेश कुमार बंसल की ओर से भी सभी संबंधित विभागों को निर्देश जारी किए गए थे। इन निर्देशों में सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों के विज्ञापन, प्रचार सामग्री, पुस्तिका एवं पुस्तकों का मुद्रण, होर्डिंग्स, डिजाइन, फिल्म, वृत्तचित्र और अन्य प्रचार-प्रसार संबंधी कार्य ‘छत्तीसगढ़ संवाद’ के माध्यम से कराने पर जोर दिया गया था।
‘छत्तीसगढ़ संवाद’ की आधिकारिक वेबसाइट पर भी सरकारी विभागों के विज्ञापन और टेंडर संबंधी सामग्री प्रकाशित होती है।
अनापत्ति प्रमाण पत्र के बिना भुगतान पर रोक
निर्देशों की सबसे महत्वपूर्ण बात यह बताई गई है कि यदि किसी कारणवश ‘छत्तीसगढ़ संवाद’ संबंधित कार्य करने में सक्षम नहीं है, तो उसकी ओर से अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) जारी किया जाना चाहिए। इसके बाद ही संबंधित कार्य किसी अन्य संस्था या एजेंसी से कराने की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है।
रिपोर्ट के अनुसार, अनापत्ति प्रमाण पत्र के बिना किसी अन्य संस्था से कराए गए कार्य के बिलों का भुगतान कोषालयों से नहीं किया जाना चाहिए। इसके लिए विभागों, उपक्रमों, निगमों, मंडलों और अर्द्धशासकीय संस्थाओं को निर्देशित किया गया है।
साथ ही कोषालय अधिकारियों को भी यह सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है कि नियमों के अनुरूप ही भुगतान किया जाए। निर्देशों का पालन नहीं होने की स्थिति में संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की बात भी कही गई है।
फिर सरकारी मुद्रणालय क्यों चर्चा में?
अब सवाल यह है कि जब शासन स्तर से बार-बार प्रक्रिया स्पष्ट की जा चुकी है, तो सरकारी मुद्रणालय में होने वाले काम और ‘छत्तीसगढ़ संवाद’ के माध्यम से कराए जाने वाले काम के बीच तालमेल क्यों नहीं बन पा रहा है?
रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि कुछ विभाग अब भी ऐसे कार्य अन्य संस्थाओं से करा रहे हैं, जिनके लिए शासन की ओर से ‘छत्तीसगढ़ संवाद’ के माध्यम से कार्य कराने की व्यवस्था तय की गई है। यदि यह स्थिति सही है तो यह केवल प्रशासनिक निर्देशों की अनदेखी का मामला नहीं, बल्कि सरकारी धन के खर्च और प्रक्रिया की पारदर्शिता से भी जुड़ा विषय बन जाता है।
सरकारी धन और गुणवत्ता पर भी सवाल
सरकारी पुस्तकों, पुस्तिकाओं, प्रचार सामग्री और अन्य मुद्रित सामग्री की छपाई में बड़ी रकम खर्च होती है। इसलिए यह जरूरी है कि किस एजेंसी को काम दिया गया, किस दर पर काम कराया गया, कितनी मात्रा में सामग्री छपी और उसके भुगतान की प्रक्रिया क्या रही—इन सभी पहलुओं का स्पष्ट रिकॉर्ड उपलब्ध हो।
शासन की ओर से ‘छत्तीसगढ़ संवाद’ के माध्यम से काम कराने के पीछे गुणवत्ता और एकरूपता सुनिश्चित करने की बात कही गई है। वित्त सचिव के निर्देशों में भी सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों के प्रचार-प्रसार से जुड़े कामों में गुणवत्ता एवं एकरूपता बनाए रखने पर जोर दिया गया था।
अब कार्रवाई पर टिकी नजर
पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि शासन के पुराने और नए निर्देशों के बावजूद नियमों का पालन नहीं हो रहा है तो इसकी जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
रिपोर्ट में यह भी सवाल उठाया गया है कि बार-बार आदेश जारी होने के बावजूद व्यवस्था में पूर्ण पारदर्शिता क्यों नहीं आ पा रही है। ऐसे में अब निगाहें शासन के उच्च स्तर पर टिकी हैं कि वह संबंधित विभागों से इस संबंध में जवाब-तलब करता है या नहीं और यदि निर्देशों की अनदेखी साबित होती है तो जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की जाती है।
हालांकि, प्रकाशित रिपोर्ट में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र प्रशासनिक पुष्टि सामने नहीं आई है। इसलिए पूरे मामले में संबंधित विभागों, सरकारी मुद्रणालय और ‘छत्तीसगढ़ संवाद’ का आधिकारिक पक्ष सामने आना भी महत्वपूर्ण होगा।