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बिलासपुर। छत्तीसगढ़ में जनपद पंचायतों से सेवानिवृत्त कर्मचारियों को सरकारी कर्मचारियों के समान पेंशन का लाभ नहीं मिलेगा। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने इस संबंध में दायर 21 से अधिक याचिकाओं को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि पंचायत कर्मचारी राज्य के शासकीय सेवक नहीं हैं। इसलिए उन्हें सरकारी कर्मचारियों के समान पेंशन देने का कोई वैधानिक प्रावधान नहीं है।
यह फैसला जस्टिस बिशु दत्ता गुरु की पीठ ने सुनवाई के दौरान दिया। मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया था कि पंचायतों में लंबे समय तक समान पदों पर काम करने वाले कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन से वंचित करना उनके अधिकारों और समानता के सिद्धांत के खिलाफ है।
धारा 131 का दिया गया हवाला
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से संविधान के अनुच्छेद 131 सहित पुराने सेवा प्रावधानों और पेंशन संबंधी अधिकारों का हवाला दिया गया। उनका कहना था कि पंचायत कर्मचारियों की पुरानी सेवा शर्तों और उनसे जुड़े पेंशन अधिकारों को संरक्षण मिलना चाहिए।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी बताया कि जनपद पंचायत गुंडरदेही, बालोद और तखतपुर, बिलासपुर में समान पदों पर काम कर चुके कुछ कर्मचारियों को पेंशन का लाभ दिया जा रहा है। ऐसे में दूसरे कर्मचारियों को पेंशन से वंचित करना समानता के अधिकार के खिलाफ है। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का भी हवाला दिया गया।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
राज्य शासन की ओर से कोर्ट को बताया गया कि याचिकाकर्ता जनपद पंचायत के कर्मचारी थे, राज्य सिविल सेवा के कर्मचारी नहीं। इसलिए उन पर राज्य सरकार के नियमित कर्मचारियों के लिए लागू पेंशन संबंधी प्रावधान सीधे लागू नहीं होते।
शासन ने बताया कि 1976 के संबंधित सेवा नियमों में सेवानिवृत्ति लाभ के रूप में भविष्य निधि की व्यवस्था थी। इसके बाद पंचायत सेवा से जुड़े 1999 के नियमों में पेंशन का कोई प्रावधान नहीं किया गया।
कोर्ट के समक्ष यह भी बताया गया कि संबंधित कुछ याचिकाकर्ता अंशदायी भविष्य निधि (CPF) का लाभ पहले ही ले चुके हैं। ऐसे में उन्हें अब सरकारी कर्मचारियों के समान पेंशन का लाभ देने का कोई आधार नहीं बनता।
कुछ कर्मचारियों को स्थानीय निधि से मिल रही पेंशन
मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी सामने आया कि गुंडरदेही के तीन और तखतपुर के तीन कर्मचारियों को संबंधित जनपद पंचायतों की ओर से स्थानीय निधि बनाकर पेंशन दी जा रही है।
हालांकि, शासन की ओर से इस व्यवस्था को सरकारी पेंशन व्यवस्था के समान नहीं माना गया। बताया गया कि पंचायतों द्वारा स्थानीय स्तर पर किए जा रहे ऐसे भुगतान के आधार पर सभी पंचायत कर्मचारियों को राज्य सरकार के कर्मचारियों के समान पेंशन का अधिकार नहीं दिया जा सकता।
इसी मामले को लेकर पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने संबंधित पंचायतों को नोटिस भी जारी किए हैं।
21 से अधिक याचिकाओं पर आया फैसला
हाईकोर्ट के इस फैसले का असर उन पंचायत कर्मचारियों और सेवानिवृत्त कर्मचारियों पर पड़ सकता है, जो राज्य सरकार के नियमित कर्मचारियों के समान पेंशन की मांग कर रहे थे। अदालत ने 21 से अधिक याचिकाओं को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि पंचायत सेवा और राज्य सिविल सेवा अलग-अलग श्रेणियां हैं और पंचायत कर्मचारियों को केवल इस आधार पर सरकारी कर्मचारियों जैसी पेंशन नहीं दी जा सकती।
इस फैसले से उन सेवानिवृत्त पंचायत कर्मचारियों की उम्मीदों को झटका लगा है, जो लंबे समय से सरकारी कर्मचारियों के समान पेंशन व्यवस्था की मांग कर रहे थे। वहीं, स्थानीय निधि से कुछ कर्मचारियों को पेंशन दिए जाने के मामले में विभागीय स्तर पर जारी नोटिस के बाद आगे की कार्रवाई भी महत्वपूर्ण होगी।