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chhattisgarh high court quashes eight criminal cases against family sit found cases fake
बिलासपुर। एक ही परिवार के सदस्यों के खिलाफ अलग-अलग थानों में दर्ज आठ आपराधिक मामलों को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने गंभीरता से लेते हुए सभी मामलों की आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी है। कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध परिस्थितियों को समग्र रूप से देखने पर इन मामलों में अभियोजन को जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग के समान होगा।
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी मामले में चार्जशीट दाखिल हो जाने मात्र से हाईकोर्ट की हस्तक्षेप करने की शक्ति समाप्त नहीं हो जाती। यदि बाद में हुई आधिकारिक जांच से यह सामने आता है कि मुकदमा जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा, तो हाईकोर्ट आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर सकता है।
2019 से 2021 के बीच दर्ज हुए आठ मामले
मामले के अनुसार वर्ष 2019 से 2021 के बीच एक ही परिवार के सदस्यों के खिलाफ रायपुर, दुर्ग, भिलाई और मुंगेली क्षेत्र के अलग-अलग थानों में कुल आठ आपराधिक मामले दर्ज किए गए थे।
इनमें रायपुर के मौदहापारा थाने में अपराध क्रमांक 107/2019, दुर्ग के कुम्हारी थाने में अपराध क्रमांक 192/2019 और पुरानी भिलाई थाने में अपराध क्रमांक 412/2020 शामिल थे। इसके अलावा वर्ष 2021 में मुंगेली क्षेत्र में अपराध क्रमांक 14/2021, 58/2021, 243/2021 और 328/2021 सहित अन्य मामले दर्ज किए गए।
इन मामलों में भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 467, 468 और 471/34 समेत कई गंभीर धाराओं के तहत अपराध दर्ज किए गए थे। एक मामले में पुलिस ने जांच पूरी करने के बाद चार्जशीट और पूरक चार्जशीट भी दाखिल कर दी थी। यह मामला न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, मुंगेली की अदालत में लंबित था।
एसआईटी ने जांच में सभी मामलों को बताया फर्जी
मामलों की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने जांच के लिए विशेष जांच दल यानी एसआईटी का गठन किया था। एसआईटी की जांच में सभी आठ मामलों को फर्जी पाया गया। जांच के दौरान संबंधित विवेचक की भूमिका और लापरवाही भी सामने आई। इसके बाद संबंधित पुलिस अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के निर्देश दिए गए।
राज्य सरकार की ओर से 8 अगस्त 2024 को हाईकोर्ट में दाखिल हलफनामे में भी इस जांच से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी दी गई। सरकार ने बताया कि रायपुर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक ने 30 जून 2024 को पुलिस महानिदेशक को भेजी अपनी रिपोर्ट में सभी आठ मामलों को फर्जी बताया था।
एक विवाद के बाद लगातार दर्ज होते गए मामले
याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि सभी आपराधिक मामले मूल रूप से एक ही विवाद से जुड़े हुए थे। बाद में अलग-अलग स्थानों पर शिकायतें दर्ज कराकर परिवार के सदस्यों को आपराधिक मामलों में फंसाया गया।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि बाद में दर्ज किए गए मामलों के शिकायतकर्ता पहले दर्ज मामलों से जुड़े लोगों के संपर्क में थे। कुछ मामलों में तो ऐसे लोगों की गिरफ्तारी दिखाई गई, जिनके बारे में याचिकाकर्ताओं का दावा था कि वे उस समय पहले से ही जेल में थे।
महिला से जुड़ा विवाद बना मामलों की वजह
याचिकाकर्ताओं के अनुसार पूरे विवाद की शुरुआत परिवार की एक महिला की पीयूष तिवारी नामक व्यक्ति से पहचान के बाद हुई थी। आरोप लगाया गया कि उक्त व्यक्ति ने खुद को अविवाहित पुलिस अधिकारी बताते हुए महिला से विवाह का वादा किया था।
बाद में महिला को उसके पहले से विवाहित होने की जानकारी मिली। इसके बाद उसने पीयूष तिवारी से संबंध समाप्त कर लिया और 5 अप्रैल 2018 को बिलासपुर स्थित आर्य संस्कार केंद्र में दूसरे व्यक्ति से विवाह कर लिया।
याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि इसके बावजूद पीयूष तिवारी महिला पर संबंध बनाए रखने का दबाव डालता रहा। साथ ही निजी तस्वीरों को सार्वजनिक करने की धमकी भी दी गई। इसके बाद महिला, उसके पति और परिवार के अन्य सदस्यों के खिलाफ अलग-अलग स्थानों पर आपराधिक मामले दर्ज होने का सिलसिला शुरू हुआ।
चार्जशीट दाखिल होने के बावजूद हाईकोर्ट का हस्तक्षेप
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने एसआईटी की रिपोर्ट और राज्य सरकार की ओर से पेश दस्तावेजों पर विचार किया। कोर्ट के सामने यह तथ्य भी था कि एक मामले में चार्जशीट और पूरक चार्जशीट दाखिल हो चुकी थी और मामला ट्रायल कोर्ट में लंबित था।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल चार्जशीट दाखिल हो जाने से एसआईटी की बाद की जांच और उसकी रिपोर्ट को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने कहा कि आपराधिक कार्यवाही का उद्देश्य न्याय सुनिश्चित करना है, न कि ऐसी प्रक्रिया को जारी रखना जो उपलब्ध सामग्री के आधार पर न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग में बदल जाए।
कोर्ट ने सभी आठ मामलों की कार्यवाही की रद्द
डिवीजन बेंच ने उपलब्ध परिस्थितियों, एसआईटी की जांच और राज्य सरकार के हलफनामे में सामने आए तथ्यों को समग्र रूप से देखते हुए माना कि इन मामलों में अभियोजन को आगे जारी रखना उचित नहीं होगा।
हाईकोर्ट ने सभी आठ आपराधिक मामलों से संबंधित आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। कोर्ट के इस फैसले से संबंधित परिवार के सदस्यों को बड़ी राहत मिली है।
इस फैसले में हाईकोर्ट ने यह महत्वपूर्ण सिद्धांत भी दोहराया कि न्यायालय के पास ऐसी आपराधिक कार्यवाही में हस्तक्षेप करने की शक्ति बनी रहती है, जहां बाद की आधिकारिक जांच से यह सामने आए कि मुकदमा जारी रखना कानून और न्यायिक प्रक्रिया के उद्देश्य के विपरीत होगा।