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बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने बस्तर संभाग में हेड मास्टर (प्रधानपाठक) पदोन्नति प्रक्रिया पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। कोर्ट ने 23 मार्च 2026 को जारी पदोन्नति आदेश के संचालन और क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगाते हुए कहा कि प्रथमदृष्टया यह आदेश निरस्त हो चुके 2019 के नियमों के आधार पर जारी किया गया प्रतीत होता है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार द्वारा लागू किए गए नए 2026 नियम 13 फरवरी 2026 से प्रभावी हैं, ऐसे में पुराने नियमों के आधार पर की गई पदोन्नति कानूनी रूप से संदिग्ध है।
यह मामला दुर्गेश कुमार कश्यप समेत अन्य शिक्षकों द्वारा दायर याचिका पर सामने आया। मामले की सुनवाई जस्टिस पी.पी. साहू की सिंगल बेंच में हुई। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता देवाशीष तिवारी और राज्य की ओर से गैरी मुखोपाध्याय ने पक्ष रखा।
याचिकाकर्ताओं के वकील ने कोर्ट में दलील दी कि 2026 के नए नियमों के तहत टीईटी (Teacher Eligibility Test) अनिवार्य योग्यता है, जबकि जिन शिक्षकों को पदोन्नति दी गई, वे टीईटी पास नहीं हैं। उन्होंने कहा कि यह आदेश आरटीई अधिनियम, एनसीटीई विनियम और सुप्रीम कोर्ट के 2025 के फैसले के भी खिलाफ है, जिसमें बिना टीईटी पदोन्नति को अवैध माना गया है। दलीलों को सुनने के बाद हाई कोर्ट ने पदोन्नति आदेश पर रोक लगा दी।
इस फैसले के बाद पूरे प्रदेश में हेडमास्टर पदोन्नति प्रक्रिया पर अनिश्चितता बढ़ गई है। याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि नई 2026 नियमावली और एनसीटीई मानकों के अनुसार ही पूरी प्रक्रिया दोबारा कराई जाए।
छत्तीसगढ़ समग्र शिक्षक संघ के प्रांताध्यक्ष रवीन्द्र राठौर ने फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि एनसीटीई नियम लागू होने से पहले नियुक्त शिक्षकों पर टीईटी अनिवार्यता लागू करना गलत है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पुराने शिक्षकों के हितों के खिलाफ बताया और राज्य सरकार से जल्द समीक्षा याचिका दाखिल करने की मांग की। साथ ही चेतावनी दी कि यदि सरकार कदम नहीं उठाती है तो संघ स्वयं सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशन दायर करेगा।
हाई कोर्ट के इस अंतरिम आदेश के बाद फिलहाल बस्तर संभाग में हेडमास्टर पदोन्नति प्रक्रिया ठप हो गई है। मामले की अगली सुनवाई में आगे की स्थिति साफ होगी।