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chhattisgarh-nearly-naxal-free-after-five-decades-of-violence
रायपुर: 1968 में आंध्रप्रदेश से बस्तर में प्रवेश करने वाले नक्सलियों का 5 दशकों का आतंक अब लगभग समाप्त हो गया है। शुरुआती दिनों में विचारधारा के प्रचार से शुरू हुई यह हिंसक आंदोलन धीरे-धीरे हथियारबंद संगठन में बदल गया और ग्रामीणों के बीच डर और नियंत्रण कायम किया।
1990 के दशक में सरगुजा क्षेत्र तक पहुंचने वाले नक्सली 2010 तक चरम पर रहे। तत्कालीन आईजी एसआरपी कल्लूरी की कार्रवाई के बाद 2015 में सरगुजा नक्सलमुक्त घोषित किया गया। लेकिन बस्तर की घने जंगलों, पहाड़ों और इंद्रावती नदी की वजह से नक्सलियों का मनोबल लगातार बढ़ा।
तेलंगाना, ओडिशा, आंध्र और झारखंड से सटे बस्तर में नक्सली पुलिस कार्रवाई से भागकर दूसरे राज्यों में छिप जाते रहे।
2024 में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के निर्देश पर केंद्र और राज्य सरकारों ने मिलकर बड़े पैमाने पर अभियान चलाया। लगभग 72,000 सुरक्षा बल और केंद्र की एजेंसियों की निगरानी में नक्सलियों के बड़े नेता क्रमशः मारे गए। 21 मई 2025 को महासचिव बसवाराजू के मारे जाने के बाद नक्सलियों में घबराहट बढ़ी और तेजी से सरेंडर का दौर शुरू हुआ।
अब तक छत्तीसगढ़ में 535 नक्सली मारे जा चुके हैं।2,898 नक्सलियों ने सरेंडर किया। 31 मार्च 2026 तक छत्तीसगढ़ लगभग पूरी तरह नक्सलवाद से मुक्त हो गया।
हालांकि, तेलंगाना का बड़ा नेता गणपति और झारखंड का मिसिर बेसरा अब भी सरकार की पकड़ से दूर हैं। छत्तीसगढ़ की पांच एरिया कमेटियों में सिर्फ 23 नक्सली बचे हैं, जो गांवों में छिपे हैं।
15 अगस्त 2025 को कांकेर जिले के बिनागुंडा गांव में 20-21 वर्षीय मनेश नुरेटी को नक्सलियों ने हत्या कर दी, क्योंकि उसने स्वतंत्रता दिवस पर गांव में नक्सली स्मारक पर तिरंगा फहराया और राष्ट्रगान गाया। यह घटना नक्सलियों की बर्बरता और लोकतंत्र के लिए नागरिकों की बहादुरी का प्रतीक बन गई।
छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद पर विजय जवानों के बलिदान और रणनीतिक कार्रवाई का परिणाम है। अब राज्य में सभी बड़े नक्सली कैडर या तो सरेंडर कर चुके हैं या मारे जा चुके हैं। यह लोकतंत्र की जीत का पर्व और सुरक्षा बलों की सफलता का प्रतीक है।