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भोपाल। मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा उपचुनाव के लिए भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) द्वारा उम्मीदवारों की सूची जारी किए जाने के बाद राज्य की राजनीति में नई बहस छिड़ गई है। लंबे समय से पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा की वापसी की अटकलें लगाई जा रही थीं, लेकिन पार्टी ने उनकी जगह आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाकर सभी राजनीतिक समीकरण बदल दिए।
बीजेपी के इस फैसले को न केवल दतिया बल्कि पूरे ग्वालियर-चंबल क्षेत्र की राजनीति में बड़ा संदेश माना जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में इसे नरोत्तम मिश्रा के सियासी भविष्य से जोड़कर देखा जा रहा है।
नरोत्तम मिश्रा की वापसी की थी मजबूत चर्चा
2023 विधानसभा चुनाव में हार के बाद नरोत्तम मिश्रा लगातार दतिया में सक्रिय बने हुए थे। चुनाव परिणाम आने के बाद उन्होंने एक शायरी भी कही थी - “समुद्र का पानी ठहरा हुआ मत समझना, फिर लौट के आऊंगा।”
इसी बयान के बाद से माना जा रहा था कि उपचुनाव में पार्टी उन्हें फिर मौका दे सकती है।
उपचुनाव की घोषणा के बाद उनके निवास और पार्टी कार्यालय पर समर्थकों की भीड़ जुटने लगी। समर्थक फूल-मालाओं के साथ उनकी वापसी का स्वागत कर रहे थे। राजनीतिक गतिविधियां भी तेज हो गई थीं। बताया जाता है कि उनके बेटे ने नामांकन फॉर्म तक खरीद लिया था। क्षेत्र में सामाजिक और जातीय समीकरणों को साधने के लिए बैठकों का दौर चला और स्थानीय स्तर पर जनसंपर्क भी बढ़ाया गया।
दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के बाद बदले समीकरण
राजनीतिक चर्चाओं के बीच राजेंद्र भारती की याचिका दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा खारिज किए जाने के बाद यह माना जा रहा था कि अब नरोत्तम मिश्रा की उम्मीदवारी लगभग तय है। हालांकि, उम्मीदवारों की अंतिम सूची में बीजेपी ने आशुतोष तिवारी को टिकट देकर सभी अटकलों पर विराम लगा दिया।
कौन हैं आशुतोष तिवारी?
आशुतोष तिवारी लंबे समय से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भाजपा संगठन से जुड़े रहे हैं। वे ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में संगठन मंत्री की जिम्मेदारी निभा चुके हैं। इसके अलावा मध्य प्रदेश हाउसिंग बोर्ड के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। संगठन में उनकी छवि अनुशासित और भरोसेमंद नेता की मानी जाती है।
हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दतिया में जनाधार और व्यक्तिगत प्रभाव के मामले में उनकी तुलना नरोत्तम मिश्रा से नहीं की जा रही है।
उम्मीदवार घोषित होने के बाद दतिया में नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों ने नाराजगी जाहिर की। भाजपा कार्यालय के बाहर प्रदर्शन हुए और "नरोत्तम मिश्रा जिंदाबाद" के नारे लगाए गए।
समर्थकों का कहना है कि जिस नेता ने चार बार दतिया विधानसभा सीट पर भाजपा को जीत दिलाई और वर्षों तक क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया, उसे टिकट न देना कार्यकर्ताओं की भावनाओं के विपरीत फैसला है।
नरोत्तम मिश्रा की चुप्पी बनी चर्चा
टिकट कटने के बाद नरोत्तम मिश्रा की ओर से अभी तक कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। हालांकि उनके करीबी समर्थक इसे उनके राजनीतिक सम्मान से जुड़ा मामला बता रहे हैं। उनकी चुप्पी को लेकर कई तरह के राजनीतिक कयास लगाए जा रहे हैं।
क्या बीजेपी में बदल रही है नेतृत्व की रणनीति?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा अब संगठन आधारित नेतृत्व को अधिक प्राथमिकता देती दिखाई दे रही है। ऐसे में कई वरिष्ठ नेताओं की भूमिका सीमित होने की चर्चा भी तेज हो गई है।
दूसरी ओर, कुछ विश्लेषक इसे पार्टी के भीतर नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने की रणनीति मान रहे हैं, जबकि विपक्ष इसे वरिष्ठ नेताओं की उपेक्षा के रूप में पेश करने की कोशिश कर सकता है।
अब नजर नरोत्तम मिश्रा के अगले कदम पर
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या नरोत्तम मिश्रा पार्टी के फैसले को स्वीकार कर पूरी ताकत से चुनाव प्रचार करेंगे या आगे चलकर उनकी राजनीतिक भूमिका में कोई नया मोड़ देखने को मिलेगा।
दतिया उपचुनाव अब केवल एक विधानसभा सीट का चुनाव नहीं रह गया है, बल्कि यह मध्य प्रदेश भाजपा की आंतरिक राजनीति, नेतृत्व परिवर्तन और संगठन की नई रणनीति की भी परीक्षा माना जा रहा है। सभी की नजरें अब नरोत्तम मिश्रा की अगली राजनीतिक चाल पर टिकी हैं।