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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को लेकर एक बेहद गोपनीय सुरक्षा ऑपरेशन का खुलासा हुआ है। ट्रंप ने मंगलवार को पुष्टि की कि जुलाई में तुर्की से रवाना होते समय उन्होंने सुरक्षा कारणों से अपना विमान बदल लिया था। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, उस समय ईरान या उसके सहयोगियों की ओर से राष्ट्रपति के विमान पर संभावित मिसाइल हमले का गंभीर खतरा सामने आया था।
कैमरों के सामने एयर फ़ोर्स वन में सवार हुए, फिर हुआ पूरा खेल
8 जुलाई को नाटो सम्मेलन के बाद ट्रंप को अंकारा एयरपोर्ट पर पुराने Air Force One में सवार होते हुए कैमरों ने रिकॉर्ड किया था। सब कुछ सामान्य नजर आ रहा था, लेकिन इसके बाद एक बेहद असामान्य ऑपरेशन शुरू हुआ।
रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप विमान के दूसरे हिस्से से एक कैटरिंग ट्रक में पहुंचे। ट्रक को विमान के दरवाजे तक उठाया गया और वहां से उन्हें चुपचाप एक छोटे C-32A सैन्य विमान में ले जाया गया। यह विमान Boeing 757 का सैन्य रूपांतरण है और आमतौर पर उपराष्ट्रपति सहित वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारियों की यात्रा में इस्तेमाल होता है।
Air Force One बना ‘डिकॉय’
इस पूरे ऑपरेशन का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह था कि पत्रकारों और कुछ व्हाइट हाउस कर्मचारियों को कथित तौर पर यह पता ही नहीं था कि राष्ट्रपति अब उस विमान में मौजूद नहीं हैं।
पुराना Air Force One अपनी यात्रा जारी रखता रहा, जबकि ट्रंप दूसरे विमान से रवाना हुए। पत्रकारों को विमान की खिड़कियों के पर्दे बंद रखने के लिए कहा गया था। इस तरह बाहर से देखने वालों को यही लगता रहा कि राष्ट्रपति उसी विमान में यात्रा कर रहे हैं।
C-32A ने "Reach 18" कॉल साइन का इस्तेमाल किया, जबकि पत्रकारों को ले जा रहे विमान ने "AF1" कॉल साइन जारी रखा। इससे ट्रंप की वास्तविक स्थिति छिपाने की योजना और प्रभावी हो गई।
ईरान से था मिसाइल हमले का खतरा?
अमेरिकी अधिकारियों ने CBS News को बताया था कि खुफिया जानकारी में ट्रंप के विमान को निशाना बनाए जाने का संभावित खतरा सामने आया था। रिपोर्टों के अनुसार, आशंका थी कि ईरान या उसके सहयोगी विमान पर मिसाइल हमला कर सकते हैं। इसी के बाद सीक्रेट सर्विस ने वैकल्पिक योजना सक्रिय की।
ट्रंप ने मंगलवार को कहा कि वह सीक्रेट सर्विस और सेना के निर्देशों का पालन करते हैं। उनके मुताबिक, अधिकारियों ने उनसे कहा कि उन्हें दूसरे विमान से जाना होगा और उन्होंने वही किया।
हालांकि ट्रंप ने यह भी कहा कि उन्हें इस खतरे की पूरी जानकारी लेने में विशेष दिलचस्पी नहीं थी। उन्होंने कहा कि उन्हें लगातार बहुत सारी धमकियां मिलती रहती हैं।
पुराने विमान को क्यों चुना गया?
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ट्रंप तुर्की कतर से मिले नए Boeing 747-8 विमान से पहुंचे थे। यह विमान लगभग 400 मिलियन डॉलर की लागत से राष्ट्रपति के इस्तेमाल के लिए तैयार किया गया था। लेकिन तुर्की से वापसी के दौरान ट्रंप ने पुराने Air Force One का इस्तेमाल किया।
पहले ट्रंप ने विमान बदलने को लेकर सुरक्षा कारणों को स्पष्ट रूप से स्वीकार नहीं किया था और इसे पुराने Air Force One में "पुराने समय की याद" से जोड़कर बताया था। बाद की रिपोर्टों में सामने आया कि पुराने विमानों में ऐसे सुरक्षा और मिसाइल-रोधी सिस्टम मौजूद हैं जो नए विमान में उस समय पूरी तरह उपलब्ध नहीं थे।
पत्रकारों को क्यों रखा गया अंधेरे में?
इस घटना ने सबसे बड़ा सवाल प्रेस की सुरक्षा और पारदर्शिता को लेकर खड़ा किया है।
Air Force One में मौजूद पत्रकारों और कुछ कर्मचारियों को यह जानकारी नहीं थी कि राष्ट्रपति उस विमान में नहीं हैं। उन्हें खिड़कियों के पर्दे नीचे रखने को कहा गया। एक फोटोग्राफर द्वारा पर्दा खोलने पर उसे उसे फिर से बंद करने के लिए कहा गया और बताया गया कि यह राष्ट्रपति की सुरक्षा से जुड़ा निर्देश है।
सुरक्षा की दृष्टि से राष्ट्रपति की लोकेशन छिपाना समझ में आता है, लेकिन सवाल यह है कि जिस विमान को संभावित हमले के लिए डिकॉय के तौर पर इस्तेमाल किया गया, उसमें मौजूद लोगों को इसकी जानकारी क्यों नहीं दी गई।
ब्रिटेन में फिर बदला विमान
ट्रंप का C-32A विमान ब्रिटेन तक गया। इसके बाद ब्रिटेन के RAF Mildenhall बेस पर ट्रंप ने दोबारा नए कतर-प्रदत्त Air Force One में सवार होकर अमेरिका की यात्रा पूरी की। इस तरह तुर्की से अमेरिका तक की यात्रा में राष्ट्रपति की वास्तविक विमान स्थिति को कई स्तरों पर गुप्त रखा गया।
ट्रंप ने कहा—'मैं नंबर वन टारगेट हूं'
ट्रंप पहले भी दावा कर चुके हैं कि ईरान की नजर में वह हत्या के लिए प्रमुख निशाना हैं। तुर्की से वापसी के दौरान जब पत्रकारों ने विमान की खिड़कियां बंद रखने को लेकर सवाल किया था, तब भी ट्रंप ने ईरान से संभावित खतरे का संकेत दिया था। अब, कई सप्ताह बाद ट्रंप द्वारा विमान बदलने की पुष्टि ने इस पूरे घटनाक्रम को और गंभीर बना दिया है।
राष्ट्रपति की सुरक्षा किसी भी सरकार के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता होती है। ऐसे में खतरे की स्थिति में विमान बदलना और राष्ट्रपति की लोकेशन छिपाना सुरक्षा रणनीति का हिस्सा हो सकता है। लेकिन इस घटना ने यह बहस भी छेड़ दी है कि सुरक्षा ऑपरेशन में शामिल अन्य यात्रियों को किस हद तक जानकारी दी जानी चाहिए।
सबसे अहम सवाल यही है- अगर Air Force One को संभावित हमलावर के लिए डिकॉय बनाया गया था, तो उसमें मौजूद पत्रकारों और कर्मचारियों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की गई?
फिलहाल अमेरिकी अधिकारियों और व्हाइट हाउस की ओर से इस पूरे ऑपरेशन की सभी सुरक्षा जानकारियां सार्वजनिक नहीं की गई हैं। लेकिन इतना साफ है कि 8 जुलाई की तुर्की यात्रा सामान्य राष्ट्रपति यात्रा नहीं थी, बल्कि ईरान से संभावित खतरे के बीच बेहद गोपनीय और असाधारण सुरक्षा ऑपरेशन का हिस्सा थी।