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government printing tender system transparency questions
सरकारी विभागों में होने वाले मुद्रण कार्यों को लेकर टेंडर प्रक्रिया और एल-1 व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। सामने आई जानकारी के अनुसार, विभिन्न विभागों में प्रिंटिंग से जुड़े काम के लिए ऐसी शर्तें रखे जाने का आरोप है, जिनसे सीमित संख्या में फर्मों को ही काम मिलने की स्थिति बन रही है। इससे पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी टेंडर प्रक्रिया को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।
बताया गया है कि सरकारी विभागों में पुस्तिकाएं, फार्म, प्रचार-प्रसार सामग्री, पंपलेट और अन्य मुद्रित सामग्री तैयार कराने के लिए समय-समय पर निविदाएं जारी की जाती हैं। इन कार्यों में एल-1 यानी सबसे कम दर वाले निविदाकार को प्राथमिकता दी जाती है। हालांकि, आरोप है कि टेंडर की शर्तों में ऐसे प्रावधान शामिल किए जा रहे हैं, जो छोटे और स्थानीय प्रिंटिंग कारोबारियों के लिए प्रतिस्पर्धा मुश्किल कर देते हैं।
मामले में सबसे बड़ा सवाल टेंडर की पात्रता शर्तों को लेकर उठाया गया है। आरोप है कि कुछ निविदाओं में अनुभव, मशीनरी, टर्नओवर और अन्य तकनीकी योग्यताओं से जुड़ी शर्तें इस तरह निर्धारित की जाती हैं कि सभी इच्छुक फर्में इसमें हिस्सा नहीं ले पातीं। इससे निविदा प्रक्रिया में वास्तविक प्रतिस्पर्धा प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।
आरोप लगाने वालों का कहना है कि जब सरकारी काम में एल-1 व्यवस्था लागू है, तो अधिक से अधिक योग्य फर्मों को समान अवसर मिलना चाहिए। यदि टेंडर की शर्तें पहले से ही इतनी कड़ी रखी जाएं कि कुछ चुनिंदा फर्में ही पात्र रह जाएं, तो एल-1 प्रक्रिया का वास्तविक उद्देश्य ही प्रभावित हो सकता है।
मुद्रण कार्य से जुड़े कारोबारियों के बीच भी इस व्यवस्था को लेकर असंतोष की बात सामने आई है। उनका कहना है कि सरकारी विभागों के प्रिंटिंग कार्य में स्थानीय प्रिंटिंग प्रेस और छोटे उद्यमियों को भी प्रतिस्पर्धा का अवसर मिलना चाहिए। उनका तर्क है कि टेंडर की शर्तें ऐसी होनी चाहिए, जिनमें गुणवत्ता, समय पर आपूर्ति और उचित दर को प्राथमिकता दी जाए, न कि ऐसी तकनीकी शर्तें जो अनावश्यक रूप से प्रतिस्पर्धा सीमित करें।
वहीं, इस पूरे मामले में टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता सबसे अहम मुद्दा बनकर सामने आ रही है। यदि किसी निविदा में निर्धारित शर्तों के कारण प्रतिस्पर्धा सीमित होती है, तो संबंधित विभाग से यह सवाल पूछा जाना स्वाभाविक है कि ऐसी शर्तें तय करने का आधार क्या था और उनका उद्देश्य क्या था।
जानकारों के मुताबिक सरकारी खरीद में पारदर्शिता और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा बेहद महत्वपूर्ण होती है। किसी भी विभाग को टेंडर तैयार करते समय यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पात्रता शर्तें काम की वास्तविक जरूरत के अनुरूप हों और अनावश्यक रूप से किसी खास वर्ग या फर्म को लाभ पहुंचाने वाली न हों।
फिलहाल लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है। ऐसे में पूरे मामले में संबंधित विभाग का पक्ष और टेंडर दस्तावेजों की वास्तविक शर्तें सामने आना जरूरी है। यदि शिकायतों में तथ्य पाए जाते हैं, तो टेंडर प्रक्रिया की समीक्षा और जिम्मेदारी तय करने की मांग भी उठ सकती है।
सरकारी मुद्रण कार्यों में एल-1 व्यवस्था और टेंडर शर्तों को लेकर उठे ये सवाल अब जांच और विभागीय स्पष्टीकरण की मांग कर रहे हैं। असली तस्वीर टेंडर की शर्तों, भाग लेने वाली फर्मों और पूरी प्रक्रिया के दस्तावेज सामने आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।