

Copyright © 2026 rights reserved by Inkquest Media
अन्य समाचार

isro privatization controversy 9 employee unions seek clarification on rocket manufacturing
बेंगलुरु/नई दिल्ली। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) में निजीकरण को लेकर उठे सवालों के बीच संगठन ने रविवार को अपनी स्थिति स्पष्ट की है। ISRO ने कहा है कि मौजूदा सुधारों को निजीकरण के बजाय भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र की क्षमता और दायरे में विस्तार के रूप में देखा जाना चाहिए। संगठन का कहना है कि बदलते समय के साथ भारत के अंतरिक्ष इकोसिस्टम को मजबूत और व्यापक बनाना जरूरी है।
दरअसल, ISRO के निजीकरण को लेकर सोशल मीडिया पर चर्चा तेज होने के बाद संगठन की ओर से यह स्पष्टीकरण सामने आया। ISRO ने अपने बयान में कहा कि जो बदलाव हो रहे हैं, उनका उद्देश्य ISRO की भूमिका को खत्म करना नहीं, बल्कि भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र की क्षमताओं को बढ़ाना है।
ISRO की भूमिका कम नहीं हो रही
अखबार में प्रकाशित जानकारी के मुताबिक, ISRO ने कहा कि जो बदलाव हो रहा है, उसे केवल ISRO के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। यह भारत के पूरे अंतरिक्ष इकोसिस्टम के दायरे और ढांचे में विस्तार से जुड़ा विषय है।
केंद्रीय एजेंसी इन-स्पेस (IN-SPACe) के चेयरमैन डॉ. पवन कुमार गोयनका ने भी कहा कि ISRO की भूमिका किसी भी तरह से कम नहीं हो रही है। उन्होंने कहा कि ISRO भारत के स्पेस सेक्टर की नींव तैयार कर रहा है और आगे भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका बनी रहेगी।
निजी कंपनियों को मिल सकती है बड़ी भूमिका
विवाद का एक प्रमुख कारण ISRO के वैज्ञानिक सलाहकार और वरिष्ठ अधिकारियों की ओर से निजी कंपनियों की बढ़ती भूमिका को लेकर दिए गए बयानों को माना जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, 21 अगस्त को डॉ. पवन ने कहा था कि ISRO आगे चलकर प्रक्षेपण यानों का निर्माण नहीं करेगा और यह काम निजी कंपनियों या सरकारी उपक्रमों द्वारा किया जाएगा।
इस बयान के बाद ISRO के कर्मचारियों के बीच भविष्य की भूमिका और रोजगार को लेकर सवाल उठे।
9 कर्मचारी संगठनों ने उठाए सवाल
रिपोर्ट के मुताबिक, ISRO के नौ कर्मचारी संगठनों ने 4 सितंबर को अध्यक्ष नारायणन को पत्र लिखकर अपनी चिंताएं सामने रखीं। संगठनों ने पूछा कि PSLV, LVM-3 और SSLV जैसे प्रक्षेपण यानों का निर्माण और संचालन भविष्य में किसके पास रहेगा।
कर्मचारी संगठनों ने केवल प्रक्षेपण यानों के निर्माण तक सवाल सीमित नहीं रखे, बल्कि तकनीक ट्रांसफर, मौजूदा नौकरियों, खाली पदों और भविष्य में होने वाली भर्तियों पर भी इसका क्या असर पड़ेगा, यह स्पष्ट करने की मांग की है।
वैज्ञानिकों और कर्मचारियों में भविष्य को लेकर चिंता
ISRO के कर्मचारियों के सवालों के पीछे सबसे बड़ी चिंता यह है कि अगर प्रक्षेपण यानों के निर्माण और संचालन में निजी कंपनियों की भूमिका बढ़ती है, तो इससे संगठन के वैज्ञानिकों और तकनीकी कर्मचारियों की जिम्मेदारियां किस तरह बदलेंगी।
हालांकि ISRO और IN-SPACe की ओर से दिए गए बयानों में इस बदलाव को भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र के विस्तार से जोड़कर देखा गया है। सरकार की ओर से निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में उठाए जा रहे कदमों का उद्देश्य देश के स्पेस सेक्टर को अधिक प्रतिस्पर्धी और व्यापक बनाना बताया जा रहा है।
फिलहाल कर्मचारियों के संगठनों द्वारा उठाए गए सवालों के बाद यह मुद्दा ISRO के भीतर भी चर्चा का विषय बना हुआ है। खासकर PSLV, LVM-3 और SSLV जैसे महत्वपूर्ण लॉन्च व्हीकल के भविष्य में निर्माण-संचालन की जिम्मेदारी किसके पास होगी, इस पर स्थिति स्पष्ट होना अहम माना जा रहा है।