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mp high court bhojshala case decision any devotee can be litigant
इन्दौर: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर पीठ ने धार के ऐतिहासिक और विवादित भोजशाला मामले में एक बेहद बड़ा और दूरगामी फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी मंदिर या धार्मिक स्थल की रक्षा और उसके धार्मिक स्वरूप को बनाए रखने के लिए कोई भी आम भक्त या श्रद्धालु अदालत में पक्षकार (Litigant) बन सकता है। कोर्ट ने कहा कि यह अधिकार केवल किसी विशेष ट्रस्ट, मंदिर समिति या प्रबंधन तक ही सीमित नहीं रखा जा सकता।
हाई कोर्ट की डबल बेंच ने 15 मई को दिए अपने इस आदेश में कई ऐसी महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं, जो आने वाले समय में देश के अन्य धार्मिक विवादों के लिए भी एक बड़ा उदाहरण (Precedent) साबित हो सकती हैं।
क्या था मामला
दरअसल, भोजशाला मामले की नियमित सुनवाई के दौरान मंदिर-मस्जिद पक्ष की अधिवक्ता शोभा मेनन ने याचिकाकर्ताओं की वैधता पर सवाल उठाया था। उन्होंने दलील दी थी कि याचिकाकर्ता मुख्य रूप से मध्य प्रदेश से बाहर के निवासी हैं और धार या भोजशाला से उनका कोई सीधा कानूनी लेना-देना नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह याचिका केवल प्रसिद्धि (Publicity) पाने के उद्देश्य से लगाई गई है, इसलिए इन्हें पक्षकार न माना जाए।
इस पर हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस के सदस्य और याचिकाकर्ता गोपाल शर्मा ने कड़ा विरोध करते हुए कहा कि वे धार के ही मूल निवासी हैं और इसके समर्थन में उन्होंने पुख्ता साक्ष्य भी कोर्ट के सामने पेश किए।
हाई कोर्ट ने कहा कि अदालत को यह देखना होता है कि किसी स्थल के प्रति समुदाय की आस्था, पूजा की परंपरा और धार्मिक विश्वास कितने लंबे समय से जुड़े हुए हैं। यदि मामला किसी देवता, धार्मिक उद्देश्य या पूजा स्थल की रक्षा से जुड़ा है, तो श्रद्धालुओं की मांग सर्वोपरि मानी जाएगी।
फैसले में देश की कानूनी परंपरा का हवाला देते हुए कहा गया कि हिंदू धार्मिक परंपरा में देवता (Deity) को केवल एक मूर्ति या प्रतीक नहीं, बल्कि एक 'वैधानिक और धार्मिक इकाई' (Legal Entity) के रूप में देखा जाता है, जो कानूनन एक 'नाबालिग' (Minor) की तरह होते हैं। इसलिए, जिस तरह एक नाबालिग की रक्षा के लिए कोई भी उसका शुभचिंतक या 'नेक्स्ट फ्रेंड' अदालत आ सकता है, उसी तरह देवता और मंदिर की रक्षा के लिए कोई भी भक्त कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है।
हाई कोर्ट ने अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि धार्मिक स्थलों से जुड़े विवादों को सिर्फ इस बात तक सीमित नहीं रखा जा सकता कि कोर्ट में याचिका लगाने का अधिकार किसके पास है। ऐसे ऐतिहासिक मामलों में केवल पुराने दस्तावेजों, स्वामित्व (Ownership) या तकनीकी पहलुओं के आधार पर अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। इसमें श्रद्धालुओं के संरक्षण की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने अपने आदेश में यह साफ कर दिया है कि यह सिद्धांत केवल धार के भोजशाला विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य में धार्मिक स्थलों से जुड़े अन्य किसी भी मामले में इसे संदर्भ (Reference) के रूप में देखा और इस्तेमाल किया जा सकता है।
इसी मामले पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का एक बड़ा बयान सामने आया है। उन्होंने हाई कोर्ट के इस फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि ‘भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के नियमों के तहत उसके संरक्षण वाले स्मारकों या धार्मिक स्थलों जैसे मस्जिद, मीनार, मकबरा या चर्च में पूजा का कानूनी प्रावधान नहीं है।’
उन्होंने आगे कहा कि भोजशाला चूंकि एएसआई संरक्षित स्मारक है, ऐसी स्थिति में इस मंदिर घोषित करके वहां पूजा की अनुमति दी जा सकती है या नहीं, इसका अंतिम निर्णय अब देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) को ही करना चाहिए। हाई कोर्ट का यह निर्णय अभी अस्पष्ट है।