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A GST fraud case involving suspicious transactions worth ₹141 crore has come to light in Raipur; firms were registered in names ranging from a deceased person—via a rent agreement—to a tea vendor and a laborer.
रायपुर। जीएसटी विभाग की जांच के बाद करोड़ों रुपये के कथित टैक्स फर्जीवाड़े का मामला सामने आया है। अगस्त्य इंटरप्राइजेस के संचालक अमन कुमार अग्रवाल के खिलाफ तेलीबांधा थाने में केस दर्ज किया गया है। विभाग का आरोप है कि अलग-अलग संदिग्ध और अस्तित्वहीन फर्मों से करीब 141.74 करोड़ रुपये की खरीद दिखाकर 23.43 करोड़ रुपये की इनपुट टैक्स क्रेडिट का लाभ लिया गया।जांच के दौरान विभाग को कई ऐसी फर्में मिलीं, जिनके पते पर वास्तविक कारोबार नहीं मिला। कुछ लोगों ने अपने नाम से फर्म चलने और बैंक खातों में हुए लेन-देन तक से इनकार कर दिया। मामले में पुलिस ने अब दस्तावेजों और कारोबार से जुड़े लेन-देन की जांच शुरू कर दी है।
जीएसटी विभाग के मुताबिक अगस्त्य इंटरप्राइजेस ने जिन फर्मों से कारोबार दिखाया, उनमें अंसारी ट्रेडर्स, ललित ट्रेड लिंक, अगस्त इंटरप्राइजेस, विनायक वेंचर्स, हुसैनी इंटरप्राइजेस, महावीर इंटरप्राइजेस और यूनिक इंटरप्राइजेस प्रमुख हैं।अंसारी ट्रेडर्स से 30.71 करोड़ रुपये का कारोबार और 5.52 करोड़ रुपये की आईटीसी दिखाई गई। ललित ट्रेड लिंक के जरिए 29.72 करोड़ रुपये का कारोबार और 5.17 करोड़ रुपये की आईटीसी का दावा किया गया। अगस्त इंटरप्राइजेस के नाम पर 22.47 करोड़ रुपये का कारोबार और 4.04 करोड़ रुपये की आईटीसी दिखाई गई।इसी तरह विनायक वेंचर्स से 17.95 करोड़ रुपये, हुसैनी इंटरप्राइजेस से 16.61 करोड़ रुपये, महावीर इंटरप्राइजेस से 12.67 करोड़ रुपये और यूनिक इंटरप्राइजेस से 11.61 करोड़ रुपये का कारोबार दिखाया गया। इन सौदों के आधार पर करोड़ों रुपये की आईटीसी का दावा किया गया।
जांच में सामने आया एक मामला सबसे ज्यादा सवाल खड़े करने वाला है। हुसैनी इंटरप्राइजेस के पते से जुड़े किरायानामे में मकान मालिक के तौर पर फूल सिंह का नाम दर्ज था। विभाग के मुताबिक फूल सिंह की वर्ष 2010 में ही मृत्यु हो चुकी थी, जबकि किरायानामा 21 मार्च 2025 को तैयार किया गया।इस फर्म के प्रोपराइटर मोहम्मद इस्लाम ने भी जांच के दौरान संबंधित कारोबार और बैंक खाते से किसी तरह का संबंध होने से इनकार किया। इसके बावजूद अगस्त्य इंटरप्राइजेस के साथ 16.61 करोड़ रुपये का कारोबार और 2.99 करोड़ रुपये की आईटीसी दिखाई गई।
जीएसटी विभाग की जांच में कई ऐसे नाम सामने आए, जिनकी वास्तविक आर्थिक स्थिति और उनके नाम पर दर्ज कारोबार के बीच बड़ा अंतर बताया गया है।यूनिक इंटरप्राइजेस के प्रोपराइटर मजहर खान ने खुद को इलेक्ट्रिशियन बताया। उनके नाम से 11.61 करोड़ रुपये का कारोबार और 2.08 करोड़ रुपये की आईटीसी दिखाई गई।अंसारी ट्रेडर्स के प्रोपराइटर एफजल अंसारी ने बताया कि वह पार्किंग में नौकरी करते हैं और अमन अग्रवाल को नहीं जानते। उनके नाम से 30.71 करोड़ रुपये का कारोबार दिखाया गया था।
अगस्त इंटरप्राइजेस के नाम से 22.47 करोड़ रुपये का कारोबार और 4.04 करोड़ रुपये की आईटीसी दिखाई गई। विभाग के अनुसार इस फर्म से जुड़े विकास यदु ने बताया कि वह पहले चाय का ठेला लगाते थे।इसी तरह ललित ट्रेड लिंक के प्रोपराइटर ललित सोनी ने जांच के दौरान बताया कि वह पिछले तीन वर्षों से नौकरी कर रहे हैं। उनके नाम से 29.72 करोड़ रुपये का कारोबार और 5.17 करोड़ रुपये की आईटीसी दिखाई गई।
विनायक वेंचर्स के नाम से 17.95 करोड़ रुपये का कारोबार और 1.36 करोड़ रुपये की आईटीसी दर्ज होने की बात सामने आई। इसके प्रोपराइटर प्रताप सिंह वर्मा ने खुद को दिहाड़ी मजदूर बताया।महावीर इंटरप्राइजेस के नाम पर 12.67 करोड़ रुपये का कारोबार और 2.27 करोड़ रुपये की आईटीसी दिखाई गई। इसके प्रोपराइटर महेश फकीरा सोनी ने पूछताछ में खुद को सफाईकर्मी बताया।
जीएसटी विभाग का कहना है कि जांच के दौरान कई फर्मों के पते पर वास्तविक कारोबार नहीं मिला। कुछ मामलों में किरायानामे और अन्य दस्तावेजों में गड़बड़ी मिली। वहीं जिन लोगों के नाम पर फर्म और बैंक खाते दर्ज थे, उनमें से कुछ ने खातों और कारोबार से ही अनजान होने की बात कही।विभाग के अनुसार पूरे मामले में कागजों पर खरीद और बिक्री दिखाकर इनपुट टैक्स क्रेडिट हासिल करने की आशंका है। जांच के आधार पर अमन अग्रवाल के खिलाफ पुलिस में शिकायत की गई, जिसके बाद तेलीबांधा थाने में मामला दर्ज किया गया है।
इस तरह के मामलों में आमतौर पर पहले फर्जी दस्तावेज, गलत पते या किरायानामे के आधार पर फर्म का जीएसटी पंजीयन कराया जाता है। इसके बाद वास्तविक माल की खरीद या बिक्री किए बिना बिलों के जरिए कागजी लेन-देन दिखाया जाता है।इन बिलों के आधार पर खरीदार इनपुट टैक्स क्रेडिट का दावा करता है। कई बार फर्जी फर्मों के बीच एक के बाद दूसरी और तीसरी फर्म को बिल जारी किए जाते हैं, जिससे रिकॉर्ड में कारोबार की एक लंबी श्रृंखला दिखाई देने लगती है। भौतिक सत्यापन, बैंक खातों, ई-वे बिल और वास्तविक कारोबार का मिलान होने पर ऐसी गड़बड़ियां सामने आ सकती हैं।फिलहाल पुलिस मामले में दर्ज दस्तावेजों, फर्मों के पंजीयन, बैंक लेन-देन और कथित खरीद-बिक्री की जांच कर रही है। आरोपों की वास्तविक स्थिति जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।