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Bastar's wounds reach the capital... victims of Naxal violence raise questions and say—come to the ground and see the reality.
रायपुर। नक्सल हिंसा से प्रभावित बस्तर के कई पीड़ितों ने अपनी आपबीती साझा करते हुए पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम के हालिया बयान पर नाराजगी जताई। बस्तर शांति समिति के नेतृत्व में पहुंचे इन लोगों ने कहा कि नक्सल हिंसा को दूर से देखने और उसका समर्थन करने वालों को एक बार उन परिवारों के बीच जाना चाहिए, जिन्होंने इस हिंसा की कीमत अपनी जान, शरीर और परिवार खोकर चुकाई है।
करीब चार दशक तक नक्सली हिंसा का सामना करने वाले बस्तर के किसान, ग्रामीण, सामाजिक कार्यकर्ता और शहीद जवानों के परिजन रायपुर के प्रेस क्लब मोतीबाग पहुंचे। उन्होंने नक्सली हमलों में घायल होने और अपने परिजनों को खोने की घटनाएं सामने रखीं।पीड़ितों का कहना था कि नक्सलवाद को केवल विचारधारा के नजरिए से देखने के बजाय उन लोगों की पीड़ा भी समझनी चाहिए, जिनकी जिंदगी हिंसा ने पूरी तरह बदल दी। उन्होंने आरोप लगाया कि नक्सली गतिविधियों का सबसे ज्यादा नुकसान स्थानीय आदिवासी और ग्रामीण समुदायों को ही उठाना पड़ा है।
बस्तर शांति समिति के तोमेश्वर सिन्हा की अगुआई में पहुंचे लोगों ने पी. चिदंबरम के सोशल मीडिया पर दिए बयान को लेकर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि नक्सल हिंसा झेल चुके लोगों के लिए ऐसे बयान बेहद पीड़ादायक हैं।पीड़ितों ने कहा कि राजनीतिक और वैचारिक बहस से अलग हटकर बस्तर की वास्तविक स्थिति को समझने की जरूरत है। उन्होंने नेताओं और कथित बुद्धिजीवियों से बस्तर का दौरा कर प्रभावित परिवारों से मिलने की अपील की।उन्होंने चेतावनी दी कि यदि नक्सल हिंसा के पीड़ितों की भावनाओं की अनदेखी जारी रही तो वे दिल्ली जाकर प्रदर्शन करने का रास्ता अपनाएंगे।
बीजापुर के अवलम मारा नक्सलियों द्वारा जमीन में लगाए गए आईईडी की चपेट में आ गए थे। विस्फोट में उनका एक पैर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। इसके बाद से उन्हें बैसाखी के सहारे चलना पड़ता है।इसी तरह बीजापुर के गौतरिया, जो मलेरिया वर्कर के तौर पर काम कर चुके हैं, नक्सली हमले में घायल हुए थे। उन पर तीन गोलियां चलाई गई थीं। हमले के बाद से उन्हें गंभीर शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
कांकेर के चारगांव निवासी सियाराम रामटेके ने बताया कि वे खेत में काम कर रहे थे, तभी नक्सलियों ने उन पर गोलीबारी कर दी। चार गोलियां उनके शरीर में लगीं। पैर की हड्डी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुई और एक गोली शरीर में फंस गई। अब वे बिना बैसाखी के चल नहीं पाते।
कांकेर के तोमेश्वर सिन्हा ने बताया कि नक्सली हिंसा में उनके पिता तालिक राम सिन्हा की हत्या हुई थी। उस समय उनकी उम्र महज 17 वर्ष थी। पिता की मौत के बाद उन्होंने नक्सलवाद के खिलाफ आवाज उठाने का फैसला किया और लगातार इस मुद्दे पर सक्रिय रहे।सुकमा की आरती उड़के भी अपने पति को नक्सली हमले में खो चुकी हैं। उनके पति मोहन सिंह पुलिस विभाग में पदस्थ थे और एंबुश में उनकी शहादत हुई थी। आरती का कहना है कि नक्सली हिंसा ने उनके जैसी कई महिलाओं से उनके जीवनसाथी छीन लिए।
तरुण कुमार कलाकार की कहानी भी नक्सली हिंसा की भयावहता को सामने रखती है। आईईडी विस्फोट में उनके पैर और कंधे गंभीर रूप से घायल हुए और धमाके की ताकत से वे करीब 15 फीट दूर जा गिरे।घायल अवस्था में नक्सलियों ने उन पर गोली भी चलाई। रातभर जंगल में पड़े रहने के दौरान उन्होंने बेहद मुश्किल परिस्थितियों में खुद को जीवित रखा। अगले दिन सड़क तक पहुंचने के बाद एक वाहन चालक की मदद से उन्हें अस्पताल ले जाया गया। उनका उपचार अब भी जारी है।
रायपुर पहुंचे पीड़ितों ने कहा कि नक्सलवाद पर किसी भी राजनीतिक या वैचारिक बहस में उन लोगों की आवाज को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए, जिन्होंने हिंसा को प्रत्यक्ष रूप से झेला है। उनके अनुसार बस्तर में शांति और विकास की चर्चा तभी सार्थक होगी, जब नक्सली हिंसा से प्रभावित परिवारों के दर्द और अनुभवों को भी केंद्र में रखा जाए।