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Chhattisgarh: Major controversy in Chhattisgarh Youth Congress elections; nominations of Satyendra Chelak and Shailendra Banjare put on hold.
रायपुर। छत्तीसगढ़ यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष पद के चुनाव में बीते सोमवार को उस समय बड़ा विवाद खड़ा हो गया, जब अध्यक्ष पद के दो प्रमुख दावेदार सत्येंद्र चेलक और शैलेंद्र बंजारे का नामांकन निर्वाचन कमेटी ने होल्ड कर दिया। दोनों उम्मीदवारों के खिलाफ पैसे देकर सदस्य बनाए जाने और चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन से जुड़ी शिकायतें सामने आई थीं।
निर्वाचन कमेटी को दोनों उम्मीदवारों के खिलाफ साक्ष्यों के साथ शिकायतें प्राप्त हुई थीं। शिकायतों के आधार पर कमेटी ने दोनों को नोटिस जारी करते हुए पूछा है कि आचार संहिता के उल्लंघन के आरोप में उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों न की जाए।
कमेटी ने दोनों उम्मीदवारों से 8 सितंबर की शाम 7 बजे तक जवाब मांगा है। तय समय सीमा में संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं मिलने पर नियमानुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी।
पिछले कुछ दिनों से यूथ कांग्रेस चुनाव को लेकर बाहरी लोगों को बुलाकर सदस्य बनाए जाने के आरोप सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों पर सामने आ रहे थे। चुनाव में पैसे के इस्तेमाल को लेकर कांग्रेस के एक पूर्व मंत्री के बयान के बाद भी विवाद गहराया था।
इन घटनाक्रमों के बीच निर्वाचन कमेटी के पास पहुंची शिकायतों ने चुनावी प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
नोटिस जारी होने के बाद चुनाव से जुड़े एप से सत्येंद्र चेलक और शैलेंद्र बंजारे के नाम हटाए जाने की जानकारी भी सामने आई है। इसके बाद संगठन के भीतर हलचल और बढ़ गई है।
हालांकि, दोनों उम्मीदवारों का अंतिम चुनावी भविष्य निर्वाचन कमेटी के जवाब और आगे की कार्रवाई पर निर्भर करेगा।
छत्तीसगढ़ यूथ कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए कुल 17 उम्मीदवार मैदान में थे। इनमें सत्येंद्र चेलक और शैलेंद्र बंजारे को प्रमुख दावेदारों में माना जा रहा था।
चेलक को पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के खेमे से, जबकि बंजारे को विधायक देवेंद्र यादव के खेमे से जोड़कर देखा जाता है। ऐसे में दोनों के नामांकन पर हुई कार्रवाई ने चुनाव को संगठन की अंदरूनी राजनीति के लिहाज से भी महत्वपूर्ण बना दिया है।
यूथ कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव पहले से ही संगठन के भीतर खेमेबाजी को लेकर चर्चा में रहा है। दो प्रमुख दावेदारों के नामांकन पर कार्रवाई के बाद यह चुनाव अब केवल संगठनात्मक पद की लड़ाई नहीं रह गया है, बल्कि इसे कांग्रेस की अंदरूनी गुटीय राजनीति में प्रतिष्ठा की लड़ाई के तौर पर भी देखा जा रहा है।