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High Court's stern remarks on Sharia Court ruling... terms divorce order legally ineffective.
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने शरिया कोर्ट की कानूनी वैधता को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि शरिया कोर्ट किसी संवैधानिक या वैधानिक अदालत के रूप में मान्य नहीं है। अदालत ने कहा कि ऐसी संस्था की ओर से जारी तलाक के आदेश की कानून की नजर में कोई बाध्यकारी कानूनी अहमियत नहीं है।जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की सिंगल बेंच ने सुनवाई के दौरान यह भी स्पष्ट किया कि देश के संविधान और प्रचलित कानूनों से ऊपर किसी धार्मिक संस्था को नहीं माना जा सकता।
मामला रायपुर निवासी नीरोश अब्बासी और उनके पति मोहम्मद आबिद खान से जुड़ा है। दोनों का विवाह 18 जुलाई 2020 को हुआ था। यह महिला की दूसरी शादी थी। उनके पहले पति का वर्ष 2015 में निधन हो गया था और पहली शादी से उनके बच्चे भी थे।विवाद उस समय बढ़ा, जब पति ने आरोप लगाया कि महिला के बच्चे नए परिवार के माहौल में सहज रूप से नहीं रह पा रहे हैं। इसी पारिवारिक विवाद के आधार पर पति ने अलग-अलग तारीखों पर तलाक-ए-हसन देने की प्रक्रिया अपनाई।हालांकि महिला ने इस तलाक को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।
विवाद को सुलझाने के लिए पति-पत्नी की सखी सेंटर में काउंसलिंग कराई गई, लेकिन बातचीत से कोई समाधान नहीं निकल सका। इसके बाद 1 नवंबर 2021 को रायपुर के महिला थाने में पति और ससुराल पक्ष के खिलाफ क्रूरता और प्रताड़ना के आरोपों में एफआईआर दर्ज की गई।मामला यहीं नहीं रुका और बाद में धार्मिक संस्था के स्तर पर भी इस विवाद में आदेश जारी किया गया।
18 जनवरी 2022 को इदारा-ए-शरिया इस्लामी कोर्ट की ओर से पति के पक्ष में एक आदेश जारी किया गया। आदेश में मुस्लिम पर्सनल लॉ के आधार पर महिला का तलाक हो जाने की बात कही गई।महिला ने इस आदेश को स्वीकार नहीं किया और इसकी वैधता को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में चुनौती दी।
सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने साफ कर दिया कि शरिया कोर्ट को कानून के तहत किसी नियमित अदालत जैसी मान्यता प्राप्त नहीं है। ऐसे में उसके आदेश को कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं माना जा सकता।कोर्ट की इस टिप्पणी को धार्मिक संस्थाओं और वैधानिक न्यायिक व्यवस्था की सीमाओं को स्पष्ट करने वाला महत्वपूर्ण फैसला माना जा रहा है। हाई कोर्ट ने दो टूक कहा कि संविधान और देश के कानून की सर्वोच्चता के सामने किसी भी धार्मिक संस्था का आदेश कानूनी अदालत के आदेश का स्थान नहीं ले सकता।