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Increasing bear sightings in settlements have raised concerns... plans to relocate them to the wild could now alter the landscape of human-wildlife conflict.
रायपुर। छत्तीसगढ़ के कई जिलों में लगातार बढ़ रहे मानव-भालू संघर्ष ने वन विभाग की चिंता बढ़ा दी है। कांकेर, महासमुंद और गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले में बस्तियों और शहरी क्षेत्रों के आसपास भालुओं की आवाजाही बढ़ने के बाद अब विभाग नई रणनीति पर काम कर रहा है। योजना के तहत आबादी के करीब लंबे समय से घूम रहे भालुओं को पकड़कर सुरक्षित और घने वन क्षेत्रों में शिफ्ट करने पर विचार किया जा रहा है।वन विभाग की प्रारंभिक योजना में नारायणपुर जिले का अबूझमाड़ क्षेत्र संभावित स्थान के रूप में सामने आया है। यहां के विस्तृत और घने जंगलों में भालुओं को प्राकृतिक आवास उपलब्ध कराने के साथ मानव बस्तियों से उनकी दूरी बढ़ाने की तैयारी की जा रही है।
वन विभाग के सामने सबसे बड़ी चुनौती कांकेर जिले में है। कांकेर शहर और आसपास के क्षेत्रों में करीब 30 भालुओं की मौजूदगी बताई जा रही है। भोजन और पानी की तलाश में ये भालू कई बार जंगल से निकलकर शहर की सीमा और नजदीकी बस्तियों तक पहुंच जाते हैं।शाम ढलने के बाद भालुओं की गतिविधियां बढ़ने से लोगों में भय का माहौल है। सुबह और शाम के समय कई इलाकों में लोगों की आवाजाही भी प्रभावित हो रही है। ऐसे हालात में वन विभाग के सामने सिर्फ लोगों की सुरक्षा नहीं, बल्कि भालुओं को भी सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी बड़ी चुनौती बन गई है।
कांकेर में हाल के दिनों में भालू के हमले में दो सगे भाई-बहन समेत तीन लोगों की मौत की घटना ने पूरे इलाके को झकझोर दिया। यह घटना नरहरपुर वन परिक्षेत्र के लारगांव-मरकाटोला गांव में हुई थी।इसके अलावा प्रदेश के अन्य जिलों में भी मानव-भालू संघर्ष की घटनाएं सामने आती रही हैं। धमतरी जिले में जंगल में मशरूम यानी पुटु की तलाश में गए दो ग्रामीण भालू के हमले में गंभीर रूप से घायल हो गए थे।मरवाही क्षेत्र में भी भालुओं की गतिविधियों ने चिंता बढ़ाई है। 19 मई को एक दुर्लभ सफेद एल्बिनो भालू भोजन और पानी की तलाश में गांव के नजदीक पहुंच गया था और उसने एक ग्रामीण पर हमला कर दिया था। वहीं अगस्त के अंतिम सप्ताह में मरवाही वन परिक्षेत्र में एक ही भालू के हमले की दो अलग-अलग घटनाओं में तीन लोग घायल हुए।
छत्तीसगढ़ में वर्तमान में भालुओं की संख्या 500 से अधिक बताई जा रही है। वन क्षेत्रों के आसपास तेजी से बढ़ती आबादी, जंगलों में मानवीय गतिविधियों का विस्तार और भोजन-पानी की तलाश में वन्यजीवों का रिहायशी इलाकों की ओर पहुंचना संघर्ष की प्रमुख वजहों में शामिल है।विशेषज्ञों के सामने अब सवाल यह है कि वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास और इंसानी बस्तियों के बीच बढ़ती दूरी को कैसे कम किया जाए। इसी दिशा में वन विभाग आबादी वाले क्षेत्रों में लगातार घूम रहे भालुओं को पकड़कर घने जंगलों में भेजने की संभावना पर काम कर रहा है।
वन विभाग का मानना है कि यदि आबादी वाले क्षेत्रों से पकड़े गए भालुओं को बड़े और सुरक्षित वन क्षेत्र में छोड़ा जाता है तो उन्हें प्राकृतिक वातावरण में रहने का बेहतर अवसर मिल सकता है। साथ ही रिहायशी इलाकों में भालुओं की आवाजाही कम होने से मानव-भालू संघर्ष की घटनाओं में भी कमी आने की उम्मीद है।पीसीसीएफ एवं वन बल प्रमुख अरुण पांडेय के अनुसार, आबादी वाले क्षेत्रों से पकड़े जाने वाले भालुओं को घने जंगलों में शिफ्ट करने पर विचार किया जा रहा है। उनका मानना है कि विस्तृत वन क्षेत्र भालुओं के लिए प्राकृतिक और सुरक्षित वातावरण उपलब्ध करा सकते हैं, जिससे इंसानों और वन्यजीवों के बीच बढ़ता संघर्ष कम करने में मदद मिल सकती है।