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Chhattisgarh's folk art scripts a new chapter of pride at Rashtrapati Bhavan... the state's rich identity showcased on the national stage through the Gedi dance.
रायपुर। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति भवन में आयोजित एट होम समारोह में छत्तीसगढ़ की पारंपरिक गेड़ी लोककला ने अपनी खास छाप छोड़ी। संस्कृति मंत्रालय के आमंत्रण पर लोक श्रृंगार भारती गेड़ी लोक नृत्य दल ने तीन दिनों तक राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के सामने गेड़ी नृत्य की प्रस्तुतियां दीं। कलाकारों की पारंपरिक प्रस्तुति के दौरान समारोह स्थल तालियों से गूंज उठा।कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने गेड़ी नृत्य दल के कलाकारों के साथ तस्वीर भी खिंचवाई। प्रस्तुति से प्रभावित पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अपनी पत्नी के साथ दल के अध्यक्ष अनिल कुमार गढ़ेवाल से मुलाकात की और गेड़ी नृत्य की परंपरा तथा इसकी विशेषताओं के बारे में जानकारी ली।उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन का भी शाल ओढ़ाकर सम्मान किया गया। केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, एस. जयशंकर और राजनाथ सिंह ने कलाकारों से मुलाकात कर उनकी प्रस्तुति की सराहना की।
छत्तीसगढ़ के इस दल ने इससे पहले गणतंत्र दिवस समारोह 2026 में कर्तव्य पथ पर भी गेड़ी नृत्य की प्रस्तुति देकर प्रदेश की लोकसंस्कृति को राष्ट्रीय मंच पर प्रदर्शित किया था। लगातार मिल रहे इन अवसरों से गेड़ी नृत्य को देशभर में नई पहचान मिल रही है।
संग्रहालय एवं संस्कृति विशेषज्ञ डॉ. अशोक तिवारी के अनुसार गेड़ी छत्तीसगढ़ की प्राचीन और व्यापक लोकपरंपराओं में शामिल है। इसका विस्तार सरगुजा से लेकर बस्तर तक देखने को मिलता है। यह परंपरा किसी एक जाति या समुदाय तक सीमित नहीं है।गेड़ी का इस्तेमाल केवल नृत्य के लिए ही नहीं होता, बल्कि इससे जुड़ी दौड़ प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जाती हैं। धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी इसका विशेष महत्व है। हरेली अमावस्या के अवसर पर बच्चे, युवा, महिलाएं और बुजुर्ग गेड़ी चढ़कर इस परंपरा को जीवित रखते हैं।पुराने समय में बारिश के मौसम में कीचड़ और जलभराव वाले रास्तों को पार करने के लिए भी गेड़ी का उपयोग किया जाता था। इससे सांप और अन्य जीवों से बचते हुए रास्ता तय करने में भी मदद मिलती थी।
गेड़ी लोक नृत्य दल के प्रमुख अनिल गढ़ेवाल के अनुसार उनके परिवार की पिछली सात पीढ़ियां इस लोकपरंपरा को आगे बढ़ाती रही हैं। वर्तमान पीढ़ी भी इसी विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाने का काम कर रही है।राष्ट्रपति भवन में प्रस्तुति के दौरान कलाकारों ने कौड़ी, चीनी मिट्टी की माला, पटसन के वस्त्र, सिकबंध और मोर पंख जैसे पारंपरिक परिधान व आभूषण धारण किए। प्रस्तुति में मांदल, बांसुरी और हारमोनियम जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों का इस्तेमाल किया गया।राष्ट्रपति भवन के इस मंच ने छत्तीसगढ़ की गेड़ी परंपरा को देश के सामने प्रस्तुत करने का महत्वपूर्ण अवसर दिया है। आठ पीढ़ियों से चली आ रही यह लोककला अब राष्ट्रीय पहचान के साथ नई पीढ़ी तक पहुंच रही है।