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Child's welfare is paramount: Madhya Pradesh High Court grants custody of 9-year-old girl to mother
इंदौर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने एक अहम और भावनात्मक फैसले में 9 वर्षीय बच्ची को पिता के साथ कनाडा वापस भेजने से इनकार करते हुए उसकी कस्टडी मां को सौंप दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि विदेशी अदालत के आदेशों का सम्मान किया जाता है, लेकिन उन्हें यांत्रिक रूप से लागू करना बच्चे के हित में जरूरी नहीं है।
भारतीय संस्कृति और भावनात्मक जुड़ाव को आधार बनाकर फैसला
न्यायालय ने अपने निर्णय में भारतीय संस्कृति, रामायण और महाभारत के संदर्भों का उल्लेख करते हुए कहा कि मां बच्चे के जीवन का पहला आश्रय होती है। अदालत ने टिप्पणी की कि लव-कुश का पालन-पोषण भी माता सीता के सान्निध्य में हुआ था, जो यह दर्शाता है कि बच्चे के भावनात्मक और मानसिक विकास में मां की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
पीठ ने यह भी कहा कि बच्ची पिछले चार वर्षों से भारत में मां के साथ रह रही है, यहां पढ़ाई कर रही है और उसी वातावरण में पूरी तरह घुल-मिल चुकी है। ऐसे में उसे अचानक अलग करना उसके मानसिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।
विदेशी आदेश बनाम बच्चे का हित
मामला एक दंपती से जुड़ा है, जो विवाह के बाद कनाडा में बस गए थे और वहीं उनकी बच्ची का जन्म हुआ। बाद में मां बच्ची को लेकर भारत आ गई और वापस नहीं लौटी। कनाडा की अदालत ने पिता के पक्ष में फैसला दिया था, जिसके आधार पर पिता ने भारतीय अदालत में याचिका दाखिल की थी।हालांकि हाई कोर्ट ने साफ कहा कि विदेशी अदालतों के आदेशों का सम्मान जरूरी है, लेकिन अगर वे बच्चे के हित के खिलाफ हों तो उन्हें लागू करना बाध्यकारी नहीं है।
मातृत्व अवकाश पर मद्रास हाई कोर्ट का सख्त रुख, तीसरी गर्भावस्था पर भी राहत जरूरी
इधर मद्रास हाई कोर्ट ने मातृत्व लाभ से जुड़े एक अन्य महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि महिलाओं को तीसरी गर्भावस्था पर भी मातृत्व अवकाश से वंचित करना उचित नहीं है।
समान अधिकार और समान पीड़ा का सिद्धांत
अदालत ने स्पष्ट किया कि पहली, दूसरी या तीसरी गर्भावस्था हर स्थिति में महिला को समान शारीरिक और मानसिक पीड़ा होती है। इसलिए मातृत्व लाभ में किसी भी प्रकार का भेदभाव न्यायसंगत नहीं है। पीठ ने यह भी कहा कि सरकार द्वारा मातृत्व अवकाश को सीमित करना उचित नहीं है और महिलाओं के स्वास्थ्य व सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
न्यायपालिका का संदेश: कानून से ऊपर मानवता और संवेदनशीलता
दोनों मामलों से यह स्पष्ट संदेश निकलता है कि न्यायालय केवल कानूनी प्रावधानों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि मानवीय संवेदनाओं, सामाजिक मूल्यों और वास्तविक परिस्थितियों को भी बराबर महत्व देते हैं। चाहे मामला बच्चे की कस्टडी का हो या महिलाओं के अधिकारों का, केंद्र में हमेशा इंसान और उसका हित ही सर्वोपरि रहता है।