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Consistency in treatment has turned the tide... 18,000 HIV patients in Chhattisgarh are now in a safe condition.
रायपुर। छत्तीसगढ़ में एचआईवी के इलाज और मरीजों की नियमित निगरानी के मोर्चे पर पहली बार जिलेवार स्तर पर उल्लेखनीय सुधार सामने आया है। प्रदेश में एचआईवी के साथ जीवन जी रहे करीब 36 हजार मरीजों में से 18 हजार का वायरल लोड अब नियंत्रित स्थिति में पहुंच गया है। इन मरीजों में वायरस की मात्रा 1000 से कम दर्ज की गई है। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार यह स्थिति उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बेहतर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।वायरल लोड नियंत्रित होने से एचआईवी से जुड़ी जटिलताओं के साथ टीबी, निमोनिया और अन्य गंभीर संक्रमणों का खतरा भी कम होता है। स्वास्थ्य विभाग इस सुधार का प्रमुख कारण समय पर जांच, एआरटी दवाओं का लगातार सेवन और मरीजों के साथ काउंसलरों का नियमित संपर्क मान रहा है।
प्रदेश के सात जिलों में स्थिति सबसे बेहतर सामने आई है। मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी, बालोद, मुंगेली, सक्ती, सारंगढ़-बिलाईगढ़, सूरजपुर और धमतरी में करीब 95 फीसदी मरीजों का वायरल लोड नियंत्रित स्तर पर मिला है।मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर में भी मरीजों की स्थिति में खासा सुधार दर्ज किया गया है। इसके अलावा बेमेतरा, दुर्ग, गरियाबंद, जांजगीर-चांपा, जशपुर, कबीरधाम, खैरागढ़-छुईखदान-गंडई, कोरबा, महासमुंद, रायगढ़, रायपुर और राजनांदगांव में नियमित रूप से दवा लेने वाले मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है।
एचआईवी मरीजों के वायरल लोड की जांच छह महीने के अंतराल पर की जाती है। जनवरी से निगरानी और दवा वितरण की व्यवस्था को और सख्त किया गया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मरीज इलाज से बाहर न हों और दवाओं का सेवन लगातार जारी रखें।किसी मरीज के दवा लेने के लिए एआरटी सेंटर नहीं पहुंचने पर काउंसलर उसके परिजनों से संपर्क करते हैं। जरूरत पड़ने पर मरीज के घर तक पहुंचकर उसे इलाज नियमित रखने के लिए प्रेरित किया जाता है। इसी सतत निगरानी को बेहतर परिणाम की अहम वजह माना जा रहा है।
एचआईवी की शुरुआती अवस्था में वायरल लोड अधिक रहने पर शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है। ऐसी स्थिति में निमोनिया, बार-बार डायरिया और टीबी जैसी बीमारियों का जोखिम बढ़ सकता है। संक्रमण लंबे समय तक नियंत्रण में न रहे तो गंभीर स्वास्थ्य जटिलताओं की आशंका भी बढ़ जाती है।नियमित एआरटी दवा लेने से शरीर में वायरस की मात्रा कम करने में मदद मिलती है। वायरल लोड नियंत्रित होने पर प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत बनाए रखने में सहायता मिलती है और दूसरी गंभीर बीमारियों का जोखिम भी घटता है।
जिन जिलों में अपेक्षित सुधार नहीं आया है, वहां स्वास्थ्य विभाग ने रणनीति और मजबूत करने की तैयारी की है। ऐसे क्षेत्रों में अधिक जांच, संक्रमित मरीजों की जल्द पहचान और पुष्टि के बाद उन्हें तुरंत एआरटी केंद्र से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है।इलाज बीच में छोड़ने वाले मरीजों की अलग सूची बनाकर उनकी निगरानी की जा रही है, ताकि वे दोबारा उपचार से जुड़ सकें और वायरल लोड को नियंत्रित स्तर पर लाया जा सके।डॉ. खेमराज सोनवानी, एड्स नियंत्रण कार्यक्रम के अतिरिक्त परियोजना संचालक के अनुसार, मरीज के इलाज में केवल दवा ही नहीं, बल्कि नियमित काउंसलिंग और लगातार संपर्क भी अहम भूमिका निभाता है। एआरटी केंद्रों के काउंसलर मरीज और उनके परिवार से संपर्क बनाए रखते हैं तथा दवा की नियमितता पर नजर रखते हैं।