

Copyright © 2026 rights reserved by Inkquest Media
अन्य समाचार

Contract for the supply of 84 Ayurvedic medicines in Chhattisgarh mired in controversy... State-run companies concealed information regarding investigations and bribery.
रायपुर। छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेस कॉर्पोरेशन (सीजीएमएससी) ने सितोपलादि, लवण भास्कर चूर्ण, व्याघ्रनख अवलेह और प्रवाल सिटी समेत 84 आयुर्वेदिक दवाओं के रेट कॉन्ट्रैक्ट के लिए टेंडर जारी किया था। इसमें ठेका हासिल करने की कोशिश कर रहीं दो बड़ी सरकारी कंपनियों ने अपने खिलाफ दर्ज मामलों और जांच से जुड़ी जानकारियां टेंडर दस्तावेजों में जाहिर नहीं कीं।
जांच में सामने आया कि कर्नाटक एंटीबायोटिक्स एंड फार्मास्युटिकल्स लिमिटेड (केएपीएल) के तत्कालीन प्रबंध निदेशक को रिश्वत लेते पकड़ा गया था, लेकिन कंपनी ने इस मामले का उल्लेख नहीं किया। वहीं, एचएलएल ने भी प्री-कॉन्ट्रैक्ट इंटीग्रिटी पैक्ट में सीबीआई की एफआईआर और उसमें कंपनी की भूमिका की जांच से जुड़ी जानकारी नहीं दी।
इतना ही नहीं, उत्पादन क्षमता और अनुभव साबित करने के लिए जरूरी मार्केट स्टैंडिंग सर्टिफिकेट को लेकर भी सवाल उठे। आरोप है कि केएपीएल ने गलत तरीके से तैयार प्रमाणपत्र जमा किया, जबकि एचएलएल ने यह प्रमाणपत्र प्रस्तुत ही नहीं किया। सीजीएमएससी ने अंततः टेंडर निरस्त कर दिया, क्योंकि उसके मुताबिक कोई भी बिडर पात्रता की शर्तें पूरी नहीं कर पाया।सीजीएमएससी हर साल करीब 40 से 50 करोड़ रुपये की आयुर्वेदिक दवाएं खरीदता है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि टेंडर में गलत या अधूरे दस्तावेज देने वाली कंपनियों के खिलाफ अब तक क्या कार्रवाई हुई?
कंपनी की ओर से दिए गए उत्पादन संबंधी ब्यौरे के अनुसार, धारवाड़ इकाई में पिछले तीन वित्तीय वर्षों के दौरान टेंडर में शामिल 10 में से आठ दवाओं के उत्पादन का रिकॉर्ड नहीं मिला। इनमें बालचतुर्भद्र चूर्ण, लवण भास्कर चूर्ण और योगराज गुग्गुल समेत अन्य दवाएं शामिल हैं। ऐसे में सवाल है कि जब कंपनी ने इन दवाओं का उत्पादन ही नहीं किया, तो उसने तीन साल के अनुभव की पात्रता किस आधार पर पूरी बताई? उत्पादन संबंधी रिकॉर्ड और कंपनी की ओर से पेश किए गए दस्तावेजों के बीच अंतर की जांच जरूरी है।
एचएलएल: कंपनी की ओर से प्रस्तुत मैन्युफैक्चरिंग लाइसेंस और प्रोडक्ट परमिशन में संबंधित दवाओं के नाम और कोड स्पष्ट रूप से हाइलाइट नहीं किए गए थे। लाइसेंसिंग प्राधिकारी की ओर से मार्केट स्टैंडिंग सर्टिफिकेट का सत्यापन भी उपलब्ध नहीं था। आपत्ति के बाद कंपनी ने कुछ विवरण हाइलाइट किए, लेकिन इसके बावजूद आइटम कोड और टेंडर दस्तावेजों के संदर्भ का मिलान नियमानुसार नहीं हो पाया।
केएपीएल: कंपनी ने मार्केट स्टैंडिंग सर्टिफिकेट प्रस्तुत किया, लेकिन उसकी वैधता और उसे तैयार कराने की प्रक्रिया पर सवाल उठे। इसके अलावा, उत्पादन संबंधी अनुभव के दावे और उपलब्ध रिकॉर्ड में भी अंतर सामने आया।
टेंडर दस्तावेजों में कंपनी के खिलाफ आपराधिक मामलों या लंबित कानूनी कार्रवाई की जानकारी नहीं दी गई थी। जबकि 15 जुलाई को सीबीआई की एसीबी भोपाल इकाई ने केएपीएल के तत्कालीन एमडी अनुराग दानायक के खिलाफ पांच लाख रुपये की रिश्वत लेने के आरोप में ट्रैप कार्रवाई की थी और मामला दर्ज किया था। इसके बावजूद 28 जुलाई को कंपनी की ओर से दिए गए हलफनामे में कहा गया कि उसके खिलाफ कोई आपराधिक मामला या कानूनी प्रकरण लंबित नहीं है। ऐसे में कंपनी के हलफनामे में दी गई जानकारी और सीबीआई की कार्रवाई के बीच विरोधाभास सामने आया है।
एचएलएल के मामले में सीबीआई की चंडीगढ़ इकाई की ओर से पीजीआईएमईआर में फंड हेराफेरी से जुड़े प्रकरण में एफआईआर दर्ज किए जाने का उल्लेख सामने आया है। यह मामला राष्ट्रीय आरोग्य निधि अनुदान से जुड़े कथित घोटाले का है। एफआईआर में आठ लोगों के नामजद होने के साथ अन्य लोगों और कंपनियों की भूमिका की जांच का भी जिक्र है। इसमें एचएलएल का नाम भी शामिल बताया गया है।हालांकि, किसी मामले में कंपनी की भूमिका की जांच होना और उसका दोष सिद्ध होना अलग-अलग बातें हैं। इसलिए इस प्रकरण में कंपनी की जिम्मेदारी तय करने के लिए जांच के निष्कर्ष सामने आना जरूरी है।
टेंडर की शर्तों के मुताबिक, बोली लगाने वाली कंपनियों को प्री-कॉन्ट्रैक्ट इंटीग्रिटी पैक्ट में पिछले तीन वर्षों के दौरान अपने खिलाफ दर्ज मामलों और कानूनी कार्रवाई से संबंधित स्व-घोषणा देनी थी। आरोप है कि दोनों कंपनियों ने इस पैक्ट में जरूरी जानकारी का उल्लेख नहीं किया।सीजीएमएससी ने किसी भी बिडर को पात्र नहीं मानते हुए टेंडर निरस्त कर दिया। हालांकि, दस्तावेजों में सामने आई विसंगतियों के बावजूद कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई का सवाल अब भी बना हुआ है।
सीजीएमएससी के एमडी रितेश अग्रवाल ने कहा कि रेट कॉन्ट्रैक्ट टेंडर में शामिल दोनों सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के खिलाफ एफआईआर या जांच की जानकारी उन्हें नहीं है। वे इस मामले को दिखवाएंगे। यदि टेंडर की शर्तों का उल्लंघन पाया गया तो नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।