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Chhattisgarh: Controversy erupts over Congress organization in Raipur; list of 66 ward presidents cancelled within an hour... list released without approval, PCC intervenes
रायपुर। रायपुर में कांग्रेस संगठन के भीतर बड़ा विवाद सामने आया है। जिला शहर कांग्रेस कमेटी द्वारा जारी की गई 66 वार्ड अध्यक्षों की सूची को प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने महज एक घंटे के भीतर निरस्त कर दिया। यह मामला पार्टी के भीतर समन्वय और निर्णय प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
रात में जारी हुई सूची, कुछ ही देर में रद्द
जानकारी के अनुसार जिला कांग्रेस कमेटी ने शुक्रवार रात लगभग 9 बजे वार्ड अध्यक्षों की सूची जारी की थी। लेकिन करीब 9 बजकर 45 मिनट पर ही प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने हस्तक्षेप करते हुए इस सूची को अमान्य घोषित कर दिया। आरोप है कि सूची जारी करने से पहले प्रदेश स्तर से कोई अनुमति नहीं ली गई थी।
नियमों के उल्लंघन का आरोप
प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अनुसार संगठनात्मक नियुक्तियों के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। सूची में कुछ वार्डों में कार्यकारी अध्यक्षों की नियुक्ति भी की गई थी, जो पार्टी नियमों के अनुरूप नहीं मानी जा रही है।
इस संबंध में पीसीसी के प्रभारी महामंत्री मलकीत सिंह गैदू ने कहा कि बिना अनुशंसा और अनुमोदन के सूची जारी की गई थी, इसलिए इसे निरस्त कर दिया गया है।
जिला नेतृत्व का पक्ष
रायपुर शहर जिला कांग्रेस अध्यक्ष श्रीकुमार मेनन ने कहा कि वार्डों के स्वरूप के आधार पर कार्यकारी अध्यक्षों की नियुक्ति की गई थी। उन्होंने स्वीकार किया कि कुछ प्रक्रियागत खामियां रह गई हैं, जिन्हें PCC के निर्देशों के अनुसार सुधार कर दोबारा सूची जारी की जाएगी।
पर्यवेक्षक बैठक अधूरी रहने का दावा
बताया गया कि कुछ वार्डों में पर्यवेक्षकों की बैठक पूरी नहीं हो सकी थी, जिसके कारण वहां अध्यक्षों की नियुक्ति नहीं हो पाई। इससे पहले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने संगठन विस्तार को लेकर जिला स्तर पर तेजी लाने के निर्देश दिए थे।
संगठन विस्तार पर नाराजगी और दबाव
प्रदेश नेतृत्व ने हाल ही में हुई बैठक में रायपुर में संगठन विस्तार की धीमी गति पर नाराजगी जताई थी। बूथ कमेटी, पंचायत कमेटी और जिला कार्यकारिणी के गठन के लिए 15 अप्रैल तक की समयसीमा तय की गई थी।
कुल मिलाकर स्थिति
इस पूरे घटनाक्रम ने कांग्रेस संगठन के भीतर तालमेल की कमी को उजागर कर दिया है। जहां एक ओर जिला स्तर पर सूची जारी की गई, वहीं दूसरी ओर प्रदेश स्तर पर तत्काल उसे रद्द कर दिया गया, जिससे संगठनात्मक प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो गए हैं।