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Dr. Shyama Prasad Mukherjee lived the idea of one country, one constitution throughout his life: Pawan Sai
रायपुर। भारतीय जनता पार्टी छत्तीसगढ़ के प्रदेश संगठन महामंत्री पवन साय ने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जयंती के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि डॉ. मुखर्जी केवल एक शिक्षाविद नहीं, बल्कि दूरदर्शी राष्ट्रनायक थे, जिन्होंने अपने पूरे जीवन को राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए समर्पित कर दिया।
उन्होंने कहा कि आम लोगों में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के व्यक्तित्व और योगदान की जानकारी सीमित है, जबकि देश के लिए उनके कार्य सदैव स्मरणीय रहेंगे। पवन साय ने बताया कि वर्ष 1901 में कोलकाता में जन्मे डॉ. मुखर्जी बचपन से ही मेधावी छात्र थे और कम उम्र में ही कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति बने। उनका मानना था कि शिक्षा केवल रोजगार का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का सबसे प्रभावी साधन है।
पवन साय ने कहा कि डॉ. मुखर्जी ने शिक्षा व्यवस्था को तक्षशिला और नालंदा जैसी गौरवशाली परंपराओं के अनुरूप विकसित करने का सपना देखा था। उनके अनुसार शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री हासिल करना नहीं, बल्कि समाज और देश को आगे बढ़ाना होना चाहिए।
अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी तत्कालीन केंद्र सरकार में उद्योग मंत्री रहे, लेकिन सिद्धांतों से समझौता स्वीकार नहीं किया। नेहरू-लियाकत समझौते से असहमति जताते हुए उन्होंने वर्ष 1950 में केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद 21 अक्टूबर 1951 को उन्होंने भारतीय जनसंघ की स्थापना कर राष्ट्रवादी विचारधारा को नई दिशा दी।
पवन साय ने कहा कि जनसंघ की स्थापना केवल एक राजनीतिक दल बनाने के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्रवाद की विचारधारा को मजबूत करने के उद्देश्य से की गई थी। उन्होंने कहा कि किसी संस्था की स्थापना से अधिक महत्वपूर्ण उस विचार को अपने जीवन में उतारना होता है और डॉ. मुखर्जी ने इसे अपने जीवन से सिद्ध किया।
जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में उन्होंने कहा कि डॉ. मुखर्जी ने परमिट व्यवस्था का विरोध करते हुए स्पष्ट कहा था कि "एक देश में दो प्रधान, दो विधान और दो निशान नहीं चलेंगे।" उन्होंने बिना परमिट जम्मू-कश्मीर जाने का निर्णय लिया और राष्ट्र की एकता के लिए संघर्ष करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
पवन साय ने कहा कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जीवन देश की एकता, अखंडता और राष्ट्रहित के लिए समर्पण का प्रतीक है। उनके विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं और नई पीढ़ी को उनके जीवन एवं आदर्शों से प्रेरणा लेनी चाहिए।