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'From Mother to Me' at Raipur's Jora Mall
हम सभी के जीवन में अपनी मां का क्या महत्व है और जब मां हमारे पास नहीं होती, तो कैसा एहसास होता है, कुछ ऐसी ही भावनाओं को व्यक्त किया एक स्टोरीटेलर ने। मंच पर मां की साड़ी पहनकर पहुंची स्टोरीटेलर डॉ. कीर्ति सिसोदिया ने कहा " अगर खुशकिस्मत हैं तो अपनी मां को अपनी बांहों से पहनिए...क्योंकि मैंने तो आज सिर्फ अपनी मां के एहसास को पहना है। "
रायपुर के जोरा मॉल में सोमवार को यह बात सुनते ही कुछ पल के लिए माहौल बिल्कुल शांत हो गया। मौका था 'मां से मैं तक, एक कहानी' स्टोरीटेलिंग कार्यक्रम का। अपनी मां की पहली बर्थडे एनिवर्सरी पर डॉ. कीर्ति सिसोदिया ने उन्हें याद करते हुए कहा, कि बचपन में घर की साफ-सफाई, रसोई से आती खुशबू और दरवाजे पर मां का इंतजार सामान्य लगता था। लेकिन मां के जाने के बाद समझ आया कि वह सब 'घर होने का एहसास' था। आगे उन्होंने कहा, कि मां की एक सीख मुझे हमेशा याद रहती है। जिंदगी में किसी का साथ छूटे, खुद का साथ मत छोड़ना। रिश्ते निभाने से पहले खुद से रिश्ता मजबूत करो...।
स्पीकर कीर्ति ने बताया, कि बचपन में उनका घर हमेशा लोगों से भरा रहता था। मां को लोगों से मिलना, उनसे बातें करना और उनकी बातें सुनना पसंद था। रसोई भी जैसे कभी बंद नहीं होती थी। कोई खाने के वक्त घर आ गया, तो बिना खाना खिलाए जाने का सवाल ही नहीं था। स्कूल से लौटने पर साफ-सुथरा घर, अपनी जगह रखी चीजें, मां की मुस्कान और शाम को अगरबत्ती और घर में बन रहे खाने की मिली-जुली खुशबू उन्हें आज भी याद है। बचपन में समझ नहीं आता था कि घर में इतना अच्छा क्यों लगता है। अब समझ में आता है कि वह घर होने का नहीं, बल्कि घर में मां के होने का एहसास था।
आगे उन्होंने अपनी मां के साथ की गई एक यात्रा का जिक्र करते हुए कहा, कि एक बार ट्रेन की यात्रा में किसी परिवार के लिए मिठाई और नमकीन का एक पैकेट आया था। मिठाई खाने की इच्छा हुई तो उन्होंने मां से एक पीस मांगा। मां ने मना कर दिया और कहा, कि यह किसी और का सामान है। स्टेशन पर मां ने बाहर से दूसरी मिठाई खरीदकर उन्हें दी और कहा, कि अगर जिंदगी में कोई तुमपर विश्वास करता है तो चाहे वह देखे या न देखे, उसके विश्वास के साथ कभी खिलवाड़ नहीं करना चाहिए।
डॉ. कीर्ति ने बताया, कि वह अपने पिता के बहुत करीब थीं। पिता उनके दोस्त, मेंटर और गाइड थे। शादी के बाद जब वह मायके जाती तो मां समझ जाती थीं कि बेटी पिता के साथ समय बिताएगी। लेकिन पिता के जाने के बाद उन्हें पहली बार लगा, कि अब सिर्फ मां बची हैं। इसी दौरान मां के साथ उनका रिश्ता और गहरा हुआ।
उन्होंने यह भी कहा, कि हर रिश्ता जरूरी है, लेकिन सभी रिश्तों की मजबूत नींव खुद से जुड़ा रिश्ता है। जब इंसान खुद पर भरोसा करना सीखता है, तभी वह दूसरों के रिश्तों को भी मजबूती दे पाता है।
अंत में उन्होंने कहा “बिछड़ गए हैं आप, अगर तो आपकी यादों से रिश्ता जोड़ूंगी। मुझे जिद है, मैं जीने का कोई मौका नहीं छोड़ूंगी।”