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While sentencing a man to death for his wife's murder, the judge made a categorical statement: verdicts will not be swayed by the fear of the mafia, and he would step down from his post if necessary.
मुजफ्फरनगर। दहेज की मांग पूरी नहीं होने पर पत्नी को जिंदा जलाकर मारने के मामले में अदालत ने दोषी पति को मृत्युदंड की सजा सुनाई है। अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश फास्ट ट्रैक कोर्ट रवि कुमार दिवाकर ने नदीम को अपनी पत्नी शहजादी की हत्या का दोषी मानते हुए फांसी की सजा दी।अदालत के अनुसार, 23 जुलाई 2018 को नदीम ने दहेज की मांग पूरी नहीं होने पर अपनी पत्नी पर मिट्टी का तेल डालकर उसे आग के हवाले कर दिया था। कोर्ट ने इस अपराध को बेहद गंभीर और अति दुर्लभतम श्रेणी का मानते हुए मृत्युदंड को उचित माना।
अपने 77 पन्नों के फैसले में न्यायाधीश ने पति-पत्नी के रिश्ते की मूल भावना का उल्लेख करते हुए कहा कि यह संबंध प्रेम और विश्वास पर आधारित होता है। इसके विपरीत आरोपी ने अपनी पत्नी के साथ बेहद क्रूर व्यवहार किया।अदालत ने माना कि पत्नी को ठंडे दिमाग से मिट्टी का तेल डालकर जलाया गया। अपराध की प्रकृति, उसकी गंभीरता और परिस्थितियों को देखते हुए इसे अति दुर्लभतम मामलों की श्रेणी में रखा गया।
न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर के न्यायिक कार्यकाल में यह 36वां मृत्युदंड है। उन्होंने करीब 17 वर्षों के न्यायिक करियर में अब तक 36 दोषियों को फांसी की सजा सुनाई है।हालांकि इस फैसले की खास चर्चा केवल मृत्युदंड के कारण नहीं हो रही है। अपने आदेश में न्यायाधीश ने न्यायपालिका पर बाहरी दबाव, अपराधियों के प्रभाव और अपनी सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं पर भी खुलकर टिप्पणी की।
फैसले में न्यायाधीश ने लिखा कि 18 अगस्त को उन्हें हत्या और लूट से जुड़े 100 मामलों की पत्रावलियां दी गई थीं, जिन्हें बाद में वापस ले लिया गया। इसके बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के माफिया की ओर से कथित तौर पर संदेश पहुंचने का उल्लेख भी आदेश में किया गया है।न्यायाधीश के मुताबिक, उन्हें यह संदेश दिया गया कि यदि माफिया के खिलाफ कार्रवाई या कोई टिप्पणी की गई तो अदालत बदलवाने अथवा उनका जिले से बाहर तबादला कराने की कोशिश की जा सकती है।
न्यायाधीश ने अपने आदेश में बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि कोई न्यायाधीश बाहुबलियों, अपराधियों या माफिया से डरकर काम करने लगे तो उसके लिए न्यायिक संस्था में बने रहना उचित नहीं होगा।उन्होंने लिखा कि वह डर के साथ न्यायाधीश कहलाने के बजाय पद छोड़ना पसंद करेंगे। उनका कहना है कि जब तक वे अपने सिद्धांतों के अनुसार काम कर सकते हैं, तब तक न्यायिक सेवा में रहेंगे और यदि ऐसा संभव नहीं रहा तो त्यागपत्र देने में भी पीछे नहीं हटेंगे।
फैसले में न्यायाधीश ने न्यायिक स्वतंत्रता को लेकर भी अपनी स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि जब तक वह न्यायाधीश की कुर्सी पर हैं, तब तक निर्णय लेने का अधिकार उनका ही होना चाहिए।उन्होंने अपनी सुरक्षा को लेकर भी सवाल उठाए और कहा कि अपराधियों के प्रभाव तथा धमकियों के बीच न्यायिक व्यवस्था की निष्पक्षता बनाए रखना जरूरी है।
इस आदेश में हत्या के मामले में दोषी को मिली सजा के साथ न्यायिक व्यवस्था की स्वतंत्रता से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा भी सामने आया है। एक ओर अदालत ने दहेज हत्या जैसे गंभीर अपराध में मृत्युदंड सुनाया, वहीं दूसरी ओर न्यायाधीश ने अपने आदेश के माध्यम से कथित दबाव और सुरक्षा संबंधी चिंताओं को सार्वजनिक किया।