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Government clarifies stance on E-20 petrol: Engines of older vehicles won't be damaged, though maintenance costs could rise.
नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने पहली बार संसद में स्पष्ट किया है कि ई-20 पेट्रोल के उपयोग से बीएस-3 मानक वाले कुछ पुराने वाहनों के इंजन पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा, लेकिन फ्यूल सिस्टम से जुड़े कुछ रबर पार्ट्स और गैस्केट समय के साथ बदलने पड़ सकते हैं। सरकार का कहना है कि यह बदलाव सामान्य सर्विसिंग के दौरान आसानी से किए जा सकते हैं और इसके लिए इंजन में किसी बड़े संशोधन की आवश्यकता नहीं होगी।
सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने राज्यसभा में लिखित जवाब देते हुए बताया कि ई-20 ईंधन के प्रभाव को लेकर भारतीय तेल निगम, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पेट्रोलियम, सोसायटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स और ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने संयुक्त अध्ययन किया था।जून 2021 में जारी इस अध्ययन में पाया गया कि दोपहिया और चारपहिया वाहनों के इंजन में किसी प्रकार का बदलाव आवश्यक नहीं है। परीक्षण के दौरान पुराने वाहनों की कार्यक्षमता में भी कोई उल्लेखनीय कमी दर्ज नहीं की गई और न ही असामान्य टूट-फूट के संकेत मिले।
विशेषज्ञों के अनुसार मुख्य रूप से 2005 से 2016 के बीच निर्मित बीएस-3 और उससे पहले के मानकों वाले वाहन इस दायरे में आ सकते हैं। ऐसे वाहनों में फ्यूल सिस्टम के कुछ पुराने रबर कंपोनेंट्स एथेनॉल के लंबे संपर्क में आने से प्रभावित हो सकते हैं।
ई-20 पेट्रोल के इस्तेमाल के दौरान जिन हिस्सों पर असर पड़ने की संभावना बताई गई है, उनमें फ्यूल पाइप, ओ-रिंग, रबर सील, फ्यूल होज, गैस्केट, फ्यूल पंप के रबर कंपोनेंट और इंजेक्टर सील शामिल हैं।हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि ये सभी पार्ट्स इंजन के अंदर नहीं बल्कि फ्यूल सिस्टम से जुड़े होते हैं, इसलिए इन्हें बदलना अपेक्षाकृत आसान और कम खर्चीला माना जाता है।
ऑटो विशेषज्ञों के मुताबिक खर्च वाहन के ब्रांड और मॉडल पर निर्भर करेगा।दोपहिया वाहनों में लगभग 500 से 1,500 रुपये तक खर्च आ सकता है।चारपहिया वाहनों में यह खर्च करीब 2,000 से 8,000 रुपये तक पहुंच सकता है।प्रीमियम और लग्जरी वाहनों में यह राशि इससे अधिक भी हो सकती है।हालांकि यह खर्च नियमित सर्विसिंग के दौरान ही सामने आएगा और सभी वाहनों में एक साथ पार्ट्स बदलने की आवश्यकता नहीं होगी।
ई-20 पेट्रोल को लेकर माइलेज घटने की आशंकाओं पर भी सरकार ने स्पष्टीकरण दिया है। गडकरी ने कहा कि किसी वाहन की माइलेज केवल ईंधन के प्रकार पर निर्भर नहीं करती। ड्राइविंग स्टाइल, सड़क की स्थिति, वाहन का रखरखाव और ट्रैफिक जैसी कई परिस्थितियां भी ईंधन दक्षता को प्रभावित करती हैं।
विशेषज्ञ बताते हैं कि पुराने समय में इस्तेमाल होने वाले कई रबर कंपोनेंट्स को उच्च एथेनॉल मिश्रण वाले ईंधन के लिए डिजाइन नहीं किया गया था। एथेनॉल के लंबे संपर्क में आने पर कुछ रबर सामग्री सख्त, मुलायम या फूल सकती है, जिससे रिसाव या घिसावट की समस्या पैदा हो सकती है।
सरकार ने यह भी बताया कि एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल का उपयोग दुनिया के कई देशों में दशकों से किया जा रहा है। ब्राजील जैसे देशों में तो उच्च एथेनॉल मिश्रण वाले ईंधन का व्यापक उपयोग लंबे समय से सफलतापूर्वक हो रहा है। भारत में भी एथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल कार्यक्रम को चरणबद्ध और वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर लागू किया गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बीएस-3 और उससे पुराने वाहन चलाने वाले लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है। नियमित सर्विसिंग कराते रहें और फ्यूल सिस्टम से जुड़े रबर पार्ट्स की समय-समय पर जांच करवाते रहें। यदि किसी हिस्से में घिसावट या रिसाव दिखाई दे तो उसे बदल देना ही पर्याप्त होगा। इंजन को लेकर किसी बड़े खतरे की आशंका फिलहाल सामने नहीं आई है।
संसद में दिए गए जवाब के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि ई-20 पेट्रोल को लेकर इंजन खराब होने की आशंकाएं काफी हद तक निराधार हैं। हालांकि पुराने वाहनों के मालिकों को फ्यूल सिस्टम के कुछ हिस्सों की अतिरिक्त निगरानी करनी पड़ सकती है, जिससे भविष्य में किसी तकनीकी समस्या से बचा जा सके।