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Growing threat of El Niño: India may face a warmer winter, which could impact wheat yields.
नई दिल्ली। दुनिया में बदलती मौसमी परिस्थितियों के बीच अल नीनो को लेकर मौसम विशेषज्ञों की चिंता बढ़ रही है। भारत के लिए भी आने वाला समय महत्वपूर्ण रहने वाला है। इस साल मॉनसून के दौरान सामान्य से 13 फीसदी कम बारिश होने के बाद अब सर्दियों के मौसम पर नजर टिकी है। आशंका है कि अल नीनो का प्रभाव बढ़ने से तापमान सामान्य से अधिक रह सकता है, जिसका असर जल संसाधनों और कृषि क्षेत्र पर देखने को मिल सकता है। विश्व मौसम संगठन (WMO) के आकलन के मुताबिक, अल नीनो 2026 के अंत तक अधिक मजबूत हो सकता है और इसका प्रभाव 2027 तक जारी रहने की संभावना है।
अल नीनो प्रशांत महासागर से जुड़ी एक प्राकृतिक जलवायु घटना है। इसमें मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर की सतह का तापमान सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। समुद्र के तापमान में होने वाला यह बदलाव वायुमंडलीय गतिविधियों, हवाओं और दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में बारिश के पैटर्न को प्रभावित करता है।भारत में अल नीनो की स्थिति पर विशेष नजर रखी जाती है, क्योंकि इसके सक्रिय रहने के दौरान दक्षिण-पश्चिम मॉनसून कमजोर पड़ने और बारिश में कमी आने की आशंका बढ़ सकती है। हालांकि, हर अल नीनो के दौरान पूरे देश में कम बारिश हो, यह जरूरी नहीं है। इसका वास्तविक प्रभाव अन्य जलवायु परिस्थितियों और अलग-अलग क्षेत्रों की भौगोलिक स्थिति पर भी निर्भर करता है।
इस साल मॉनसून के दौरान देश के कई हिस्सों में बारिश का वितरण असमान रहा। मध्य भारत में बारिश लगभग सामान्य स्तर पर रही, जबकि पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में औसत से 26 फीसदी कम वर्षा दर्ज की गई। दक्षिण भारत में भी बारिश सामान्य से 24 फीसदी कम रही।कम बारिश के बाद यदि अल नीनो का प्रभाव और मजबूत होता है, तो देश के कुछ हिस्सों में तापमान बढ़ने की स्थिति बन सकती है। इससे जलाशयों में पानी की उपलब्धता, भूजल स्तर और फसलों की सिंचाई पर दबाव बढ़ने का जोखिम रहेगा। खासकर उन इलाकों में परेशानी बढ़ सकती है, जहां पहले से ही बारिश की कमी के कारण जल संसाधन प्रभावित हुए हैं।
विश्व मौसम संगठन ने दक्षिण एशिया जलवायु आउटलुक फोरम के अनुमान का हवाला देते हुए बताया है कि अक्टूबर से दिसंबर 2026 के बीच दक्षिण एशिया के बड़े हिस्से में अधिकतम और न्यूनतम तापमान सामान्य या उससे अधिक रह सकता है। भारत के कृषि क्षेत्र के लिए यह स्थिति महत्वपूर्ण है, क्योंकि सर्दियों का तापमान रबी फसलों की वृद्धि और उत्पादन को प्रभावित करता है।गेहूं की फसल को पर्याप्त उत्पादन के लिए अनुकूल ठंड की जरूरत होती है। यदि सर्दियों के अंतिम चरण में तापमान तेजी से बढ़ता है, तो फसल में दाने बनने और उनके विकास की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। खासकर जनवरी और फरवरी में अधिक गर्मी पड़ने से गेहूं की उपज में कमी आने का जोखिम बढ़ जाता है।हालांकि, आगामी सर्दियों में तापमान कितना बढ़ेगा और गेहूं की फसल पर उसका कितना असर होगा, यह अभी निश्चित नहीं है। अल नीनो के साथ पश्चिमी विक्षोभ जैसी मौसमी प्रणालियां भी तापमान, बारिश और ठंड की अवधि को प्रभावित करेंगी।
अल नीनो का प्रभाव केवल भारत तक सीमित नहीं रहता। इसके कारण दुनिया के विभिन्न हिस्सों में तापमान, वर्षा और तूफानों की गतिविधियों में बदलाव हो सकता है। हालांकि, इसका असर हर क्षेत्र में एक जैसा नहीं होता।दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ हिस्सों में गर्म और शुष्क मौसम के कारण जंगलों में आग लगने तथा सूखे का खतरा बढ़ सकता है। दूसरी ओर, पूर्वी अफ्रीका के कुछ क्षेत्रों में भारी बारिश और बाढ़ की स्थिति बन सकती है, जबकि अन्य इलाकों में पानी की कमी की आशंका बनी रह सकती है।प्रशांत और अटलांटिक महासागरों में भी अल नीनो का प्रभाव अलग-अलग रूप में दिखाई दे सकता है। पूर्वी प्रशांत क्षेत्र में तूफानी गतिविधियों को अनुकूल परिस्थितियां मिल सकती हैं, जबकि अटलांटिक में वायुमंडलीय बदलाव तूफानों के विकास को प्रभावित कर सकते हैं। दक्षिण अमेरिका में भी कुछ क्षेत्रों में सूखे और अन्य हिस्सों में भारी बारिश का जोखिम बना रह सकता है।
विश्व मौसम संगठन के अनुमान के अनुसार, अल नीनो के 2026 के अंत तक मजबूत होने और 2027 तक प्रभावी रहने की आशंका है। ऐसे में भारत के लिए आने वाले महीनों में तापमान, बारिश और कृषि संबंधी परिस्थितियों पर लगातार नजर रखना जरूरी होगा।कम बारिश के बाद जलाशयों में पानी की स्थिति, रबी फसलों की सिंचाई और गेहूं की पैदावार अहम मुद्दे बन सकते हैं। यदि सर्दियों में तापमान सामान्य से अधिक रहता है, तो किसानों को फसलों के विकास और सिंचाई प्रबंधन से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि अल नीनो के कारण पूरे देश में सर्दियां गर्म रहेंगी या गेहूं की पैदावार में निश्चित रूप से गिरावट आएगी। आने वाले महीनों में मौसम की वास्तविक स्थिति, पश्चिमी विक्षोभ की सक्रियता और क्षेत्रवार बारिश के आंकड़े ही इसके प्रभाव की स्पष्ट तस्वीर पेश करेंगे।