

Copyright © 2026 rights reserved by Inkquest Media
अन्य समाचार

High Court's major decision: Criminal complaint against former Chief Justice and judges quashed, said- case cannot be proceeded on mere suspicion.
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने न्यायपालिका से जुड़े एक अहम मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए पूर्व चीफ जस्टिस, एक वर्तमान हाईकोर्ट जस्टिस और राज्य की उच्च न्यायिक सेवा के कई अधिकारियों के खिलाफ दायर आपराधिक शिकायत को रद्द कर दिया है।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और जस्टिस बी. डी. गुरु की डिवीजन बेंच ने अपने आदेश में कहा कि न्यायपालिका और सार्वजनिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के खिलाफ केवल आशंका या अनुमान के आधार पर आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
आपराधिक कानून को उत्पीड़न का साधन नहीं बनाया जा सकता
डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा कि आपराधिक प्रक्रिया को किसी व्यक्ति को परेशान करने या दबाव बनाने के हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि बिना ठोस आधार के न्यायपालिका के सदस्यों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही चलने देना न्यायिक संस्थाओं की गरिमा को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि आपराधिक कार्यवाही शुरू करना कोई औपचारिक प्रक्रिया नहीं है। संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों और उच्च न्यायिक सेवा के अधिकारियों को तलब करने के गंभीर परिणाम होते हैं, इसलिए आपराधिक कानून का दुरुपयोग नहीं होने दिया जा सकता।
2015 की घटना से जुड़ा है मामला
मामला वर्ष 2015 की एक घटना से जुड़ा है, जिसमें एक टोल प्लाजा पर शिकायतकर्ता के पति के साथ कथित दुर्व्यवहार का आरोप लगाया गया था। उस समय शिकायतकर्ता के पति सुकमा में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) के पद पर कार्यरत थे। घटना के संबंध में पुलिस ने एफआईआर दर्ज की थी।
पुलिस और न्यायिक अधिकारियों पर साजिश का आरोप
शिकायत में आरोप लगाया गया था कि पुलिस ने उस मामले में आरोप पत्र दाखिल नहीं किया, क्योंकि इसमें पुलिस अधिकारियों, न्यायिक अधिकारियों, तत्कालीन चीफ जस्टिस और एक वर्तमान हाईकोर्ट जस्टिस की कथित साजिश शामिल थी।
मामले की जांच के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि शिकायत में साजिश से जुड़ा कोई ठोस तथ्य या साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया है।
IPC की धारा 120-B के तहत साजिश साबित करने के लिए जरूरी सबूत
डिवीजन बेंच ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 120B के तहत साजिश सिद्ध करने के लिए यह साबित करना जरूरी होता है कि दो या अधिक व्यक्तियों के बीच किसी अवैध कार्य को करने के लिए स्पष्ट सहमति या योजना बनी हो।
अदालत ने कहा कि शिकायत में ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं आया जिससे यह साबित हो सके कि संबंधित जजों या अधिकारियों के बीच किसी प्रकार की साजिश या सहमति बनी थी।
सेवा विवाद को आपराधिक साजिश का रूप नहीं दिया जा सकता
शिकायतकर्ता की ओर से यह भी आरोप लगाया गया कि उनके पति को नक्सल प्रभावित क्षेत्र में स्थानांतरण, वेतन वृद्धि रोकने और सेवा समाप्ति जैसी प्रशासनिक कार्रवाइयों का सामना करना पड़ा।
इस पर कोर्ट ने कहा कि ऐसे विवाद सेवा कानून के दायरे में आते हैं और इन्हें आपराधिक साजिश का रूप नहीं दिया जा सकता। अदालत ने कहा कि इस तरह की शिकायत को जारी रहने देना कानून की प्रक्रिया का गंभीर दुरुपयोग होगा।
अंततः हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि केवल अनुमान और आशंका के आधार पर न्यायपालिका और सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे नहीं चलाए जा सकते और इसी आधार पर शिकायत को रद्द कर दिया।