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How does a broken live-in relationship become a crime? The Supreme Court's sharp questions have raised a significant legal question.
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप और यौन उत्पीड़न के आरोपों को लेकर बेहद सख्त और स्पष्ट रुख दिखाया। अदालत ने महिला से पूछा कि जब संबंध लंबे समय तक आपसी सहमति से चला और उससे एक बच्चा भी है, तो अचानक इसे अपराध कैसे माना जा सकता है। कोर्ट ने साफ कहा कि केवल रिश्ता खत्म हो जाने से हर मामला आपराधिक नहीं बन जाता।
हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती, सुप्रीम कोर्ट में उठे गंभीर सवाल
यह मामला मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ दायर अपील से जुड़ा है, जिसमें महिला के पूर्व लिव-इन पार्टनर के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट की पीठ इस फैसले की वैधता पर सुनवाई कर रही है, लेकिन सुनवाई के दौरान ही महिला के दावों पर कई अहम सवाल उठाए गए।
जज की सख्त टिप्पणी, शादी नहीं तो कानूनी मजबूती भी सीमित
सुनवाई के दौरान जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा कि दोनों करीब 15 साल तक साथ रहे। अगर इतने लंबे समय तक संबंध बना रहा और फिर शादी नहीं हुई, तो अब इसे यौन उत्पीड़न कहना कैसे सही ठहराया जा सकता है। अदालत ने यह भी पूछा कि शादी से पहले महिला उस व्यक्ति के साथ रहने क्यों चली गई।
लिव-इन में जोखिम होता है, रिश्ता टूटना अपराध नहीं
अदालत ने अपने अवलोकन में स्पष्ट किया कि लिव-इन रिलेशनशिप में कोई कानूनी बंधन नहीं होता। ऐसे रिश्तों में साथ रहना दोनों की इच्छा पर निर्भर होता है और अलग होना भी। अगर कोई साथी रिश्ता खत्म कर देता है, तो इसे स्वतः अपराध नहीं माना जा सकता।
महिला की दलील, शादी का झांसा और सच्चाई छिपाने का आरोप
महिला के वकील ने अदालत को बताया कि आरोपी पहले से शादीशुदा था और उसने यह बात छिपाई। साथ ही उसने शादी का वादा कर संबंध बनाए। इस पर अदालत ने कहा कि अगर शादी हुई होती, तो महिला के अधिकार ज्यादा मजबूत होते और वह कानूनी राहत जैसे गुजारा भत्ता या दूसरी शादी का मामला उठा सकती थी।
अदालत का व्यावहारिक रुख, सजा से ज्यादा समाधान पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि अगर आरोपी को जेल भी भेज दिया जाए, तो इससे महिला को वास्तविक लाभ क्या मिलेगा। अदालत ने सुझाव दिया कि मामले में बच्चे के भविष्य को ध्यान में रखते हुए गुजारा भत्ता या मुआवजे पर विचार किया जा सकता है।
बच्चे के हित को प्राथमिकता, समझौते की संभावना तलाशने के निर्देश
पीठ ने कहा कि बच्चा अब करीब सात साल का हो चुका है, इसलिए उसके हितों की अनदेखी नहीं की जा सकती। अदालत ने दोनों पक्षों से यह पता लगाने को कहा कि क्या आपसी सहमति से कोई समाधान या समझौता संभव है।