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In Draupadi Murmu's own words: A spiritual journey from childhood faith to Rashtrapati Bhavan.
नई दिल्ली। श्रीजगन्नाथ महाप्रभु के प्रति मेरी आस्था बचपन से ही अटूट रही है। उनके भजन और प्रार्थनाएं मेरे जीवन का हिस्सा रही हैं। स्कूल और कॉलेज के दिनों में मैं अक्सर उनके भजन गाती थी। उन भजनों में मुझे केवल संगीत नहीं, बल्कि महाप्रभु का सान्निध्य महसूस होता था। आज भले ही मंच पर गीत नहीं गाती, लेकिन हर सुबह और शाम उनका स्मरण करते हुए मन ही मन भजन गुनगुनाती हूं। मुझे हमेशा यह विश्वास रहा है कि महाप्रभु हर पल मेरे साथ हैं और जीवन की हर विपत्ति में मेरा हाथ थामते हैं।आज भी भक्त कवि मधुसूदन राव की पंक्तियां मेरे मन में गूंजती हैं। उनका भाव यही है कि जब यह अनुभव हो जाए कि परमेश्वर हर समय साथ हैं, तब जीवन का हर संघर्ष सहज हो जाता है।
जब मैं छोटी थी, तभी से घर में श्रीजगन्नाथ महाप्रभु की महिमा सुनती आई हूं। गांव के हर मोहल्ले में उनके चमत्कार और कृपा की चर्चा होती थी। स्कूल में भक्त सालबेग की प्रार्थनाएं गाई जाती थीं और शिक्षक हमें पुरी के विशाल श्रीमंदिर की महिमा सुनाते थे। वह बताते थे कि वहां भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विराजते हैं। उनकी दिव्य छवि का ऐसा वर्णन सुनती थी कि बिना देखे ही मन में उनका स्वरूप बस गया।उसी समय यह भी जाना कि उन्हें महाप्रभु कहा जाता है, उनका प्रसाद महाप्रसाद कहलाता है, मंदिर बड़ा मंदिर, मार्ग विशाल पथ और समुद्र महोदधि के नाम से प्रसिद्ध है। इन बातों ने मेरे मन में ऐसी श्रद्धा जगाई, जो जीवन भर बनी रही।
मयूरभंज जिले के उपरबेड़ा गांव से पुरी काफी दूर था, इसलिए बचपन में वहां जाना संभव नहीं हो सका। बाद में पढ़ाई के लिए भुवनेश्वर पहुंची। यूनिट-2 गर्ल्स हाईस्कूल में प्रवेश लिया और छात्रावास में रहने लगी। तभी पहली बार पुरी और कोणार्क जाने का अवसर मिला।श्रीजगन्नाथ मंदिर का पहला दर्शन आज भी मेरी स्मृतियों में वैसे ही अंकित है। विशाल मंदिर, दिव्य प्रतिमाएं और वहां का आध्यात्मिक वातावरण मन को भीतर तक छू गया। ऐसा अनुभव जीवन में बार-बार नहीं मिलता।
पुरी में पूरे वर्ष अनेक पर्व मनाए जाते हैं, लेकिन रथयात्रा का महत्व सबसे अलग है। इस दिन महाप्रभु स्वयं अपने मंदिर से निकलकर विशाल पथ पर भक्तों को दर्शन देते हैं। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा तीन भव्य रथों पर सवार होकर सुदर्शन के साथ गुंडिचा मंदिर की यात्रा करते हैं। सात दिन वहां विराजने के बाद फिर वापस श्रीमंदिर लौटते हैं। यह दृश्य केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था और समर्पण का विराट उत्सव होता है।
बचपन से ही मैं स्वयं को महाप्रभु की बेटी मानती आई हूं। वे मेरे आराध्य ही नहीं, बल्कि मेरे जीवन के मार्गदर्शक भी हैं। सुख और दुख, सफलता और संघर्ष, हर परिस्थिति में मैंने उनकी उपस्थिति महसूस की है। जीवन में अनेक कठिनाइयां आईं, कई ऐसे पल आए जब सब कुछ समाप्त होता दिखाई दिया, लेकिन हर बार महाबाहु ने मुझे संभाला और आगे बढ़ने की शक्ति दी।
जब मुझे देश के राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार बनाए जाने की सूचना मिली, तब सबसे पहले मैंने महाप्रभु को याद किया। मन में केवल एक ही प्रार्थना थी कि जिस जिम्मेदारी की ओर वह मुझे ले जा रहे हैं, वहां हर कदम पर उनका आशीर्वाद बना रहे।उसी दौरान रथयात्रा का पर्व आया, लेकिन चुनावी कार्यक्रमों के कारण पुरी जाना संभव नहीं था। इसलिए दिल्ली के हौजखास स्थित श्रीजगन्नाथ मंदिर पहुंचकर उनके दर्शन किए। वहां से मिले आत्मविश्वास के साथ मैंने नामांकन दाखिल किया और पूरे उत्साह से चुनाव अभियान में हिस्सा लिया।25 जुलाई 2022 को शपथ ग्रहण के समय भी मैं मन ही मन महाप्रभु का स्मरण करती रही। उनके आशीर्वाद से शपथ समारोह सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। राष्ट्रपति के रूप में पहला संबोधन देते समय भी मुझे ऐसा लगा जैसे महाप्रभु मेरे साथ ही खड़े हों।
राष्ट्रपति बनने के बाद लंबे समय तक पुरी जाने का अवसर नहीं मिला। मन बार-बार महाप्रभु के दर्शन के लिए व्याकुल होता था। अंततः 10 नवंबर 2022 को वह दिन आया जब मुझे पुरी पहुंचने का अवसर मिला।श्रीमंदिर की ओर जाते समय जैसे ही वाहन विशाल पथ पर पहुंचा, मन में भाव उमड़ पड़ा कि यह मार्ग स्वयं महाप्रभु का है। यहां औपचारिक प्रोटोकॉल का कोई अर्थ नहीं। मैंने तुरंत वाहन रुकवाया और नंगे पैर मंदिर की ओर चल पड़ी।करीब दो किलोमीटर तक नीलचक्र और पतित पावन ध्वज को निहारते हुए आगे बढ़ती रही। रास्ते में खड़े लोगों का अभिवादन करती रही, लेकिन मन पूरी तरह महाप्रभु के चरणों में था।सिंहद्वार पहुंचते ही भावनाओं का ऐसा ज्वार उमड़ा कि मैं स्वयं को रोक नहीं सकी। पवित्र भूमि पर साष्टांग दंडवत कर महाप्रभु को प्रणाम किया। गर्भगृह में पहुंचकर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन के दर्शन करते ही मन अवर्णनीय आनंद से भर गया।
मेरे लिए महाप्रभु केवल आराध्य नहीं, बल्कि मानवता के सबसे बड़े प्रेरणास्रोत हैं। उनकी सदैव खुली रहने वाली आंखें इस बात का प्रतीक हैं कि वे हर व्यक्ति पर समान दृष्टि रखते हैं। उनके लिए कोई छोटा या बड़ा नहीं है। सभी उनके अपने हैं।उन्हीं की करुणा और समभाव से प्रेरणा लेकर मैंने समाज के हर वर्ग की सेवा को अपना कर्तव्य बनाया है। आज भी मेरी यही प्रार्थना रहती है कि महाप्रभु का आशीर्वाद सदैव बना रहे, सेवा का यह भाव कभी कम न हो और उनकी कृपा पूरे देश तथा संसार पर निरंतर बनी रहे।