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Major achievement regarding groundwater extraction in Chhattisgarh; not a single development block remains in the 'critical' category.
रायपुर, 9 सितंबर 2026। जल संरक्षण और भूजल प्रबंधन के क्षेत्र में छत्तीसगढ़ ने बड़ी उपलब्धि हासिल की है। भूजल संसाधन आकलन-2026 के मुताबिक प्रदेश में अब एक भी विकासखंड भूजल दोहन की ‘क्रिटिकल’ श्रेणी में नहीं है। वर्ष 2020 में प्रदेश के 9 विकासखंड इस श्रेणी में थे, जबकि 2025 में भी 5 विकासखंड क्रिटिकल बने हुए थे। अब ये सभी पांचों विकासखंड क्रिटिकल श्रेणी से बाहर आ गए हैं।
भूजल आकलन में इस बार 12 विकासखंडों की स्थिति में सुधार दर्ज किया गया है, जबकि किसी भी विकासखंड की श्रेणी खराब नहीं हुई। विकासखंडवार भूजल आकलन शुरू होने के बाद इसे प्रदेश का अब तक का सबसे बड़ा एक-चक्रीय सुधार बताया गया है। प्रदेश में सुरक्षित विकासखंडों की संख्या बढ़कर 127 हो गई है।
भूजल रिचार्ज भी रिकॉर्ड स्तर पर
आकलन के अनुसार प्रदेश में वार्षिक भूजल रिचार्ज बढ़कर 14.65 बिलियन घन मीटर (BCM) हो गया है, जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है। वर्ष 2017 में यह 11.57 BCM था।
जल संरक्षण संरचनाओं के निर्माण और पुराने जलस्रोतों के पुनर्जीवन का असर भी सामने आया है। वर्ष 2020 की तुलना में तालाबों और पोखरों से होने वाले भूजल रिचार्ज में 266.9 प्रतिशत, जबकि अन्य जल संरक्षण संरचनाओं से होने वाले रिचार्ज में 202.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।
वर्ष 2026 के आकलन में प्रदेशभर में कुल 2 लाख 28 हजार 736 जल संरचनाएं दर्ज की गई हैं।
पहली बार भूजल दोहन में भी आई कमी
इस बार भूजल की स्थिति में सुधार के साथ-साथ भूजल दोहन में भी गिरावट दर्ज की गई है। वर्ष 2026 में कुल भूजल दोहन 6.21 BCM रहा, जबकि पिछले आकलन चक्र में यह 6.30 BCM था। उपलब्ध आकलन रिकॉर्ड के अनुसार यह पहली वार्षिक गिरावट है।
वर्ष 2022 में प्रदेश में भूजल दोहन का स्तर 49.5 प्रतिशत तक पहुंच गया था, जो अब घटकर 46.37 प्रतिशत रह गया है। यह 70 प्रतिशत की सुरक्षित सीमा से काफी नीचे है।
बेमेतरा और राजनांदगांव में फसल विविधीकरण का असर
भूजल दोहन में कमी के पीछे गर्मी के मौसम में धान के रकबे में आई कमी को महत्वपूर्ण कारण माना गया है। खासकर बेमेतरा और राजनांदगांव में किसानों की भागीदारी से बड़ा बदलाव सामने आया है।
बेमेतरा में गर्मी के धान का रकबा करीब 26 हजार हेक्टेयर से घटकर 5 हजार हेक्टेयर रह गया है। वहीं राजनांदगांव में यह रकबा 9,400 हेक्टेयर से घटकर करीब 2,800 हेक्टेयर हो गया है। दोनों जिलों को मिलाकर गर्मी के धान के रकबे में लगभग 27,600 हेक्टेयर की कमी आई है।
बेमेतरा लगातार चार आकलन चक्रों के बाद क्रिटिकल श्रेणी से बाहर आया है। जिले में वर्ष 2023 की तुलना में कुल भूजल दोहन में करीब 20 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है।
राजनांदगांव में भी सुधार हुआ है। वर्ष 2022 में यहां भूजल दोहन 70.5 प्रतिशत तक पहुंच गया था, जो अब सुरक्षित श्रेणी में आ गया है। सिंचाई के लिए भूजल दोहन में वर्ष 2023 की तुलना में 16.4 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है।
2030 तक सभी विकासखंडों को सुरक्षित बनाने का लक्ष्य
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कहा कि यह उपलब्धि किसानों, नागरिकों और मैदानी अमले की सामूहिक भागीदारी का परिणाम है। उन्होंने कहा कि अब प्रदेश का अगला लक्ष्य वर्ष 2030 तक किसी भी विकासखंड को भूजल तनावग्रस्त स्थिति में नहीं रहने देना है।
वर्तमान में 11 जिलों के 19 विकासखंड अर्ध-संकटग्रस्त श्रेणी में हैं। सरकार अब इन क्षेत्रों पर विशेष फोकस करेगी। जल संरक्षण, भूजल पुनर्भरण, फसल विविधीकरण और जनभागीदारी के जरिए इन्हें भी सुरक्षित श्रेणी में लाने का प्रयास किया जाएगा।
वर्ष 2026-27 में बेमेतरा, बिलासपुर और जांजगीर-चांपा के करीब 5,442 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में NAQUIM 2.0 के तहत जलभृत मानचित्रण अध्ययन प्रस्तावित है।
मुख्यमंत्री ने किसानों और मैदानी अमले को दिया श्रेय
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने इस उपलब्धि पर प्रदेशवासियों को बधाई देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘जन शक्ति से जल शक्ति’ के आह्वान का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जल संरक्षण का काम केवल सरकारी स्तर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि किसानों और आम नागरिकों की भागीदारी से यह व्यापक जनआंदोलन का रूप ले चुका है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि भूजल की यह उपलब्धि दफ्तरों में नहीं, बल्कि खेतों और गांवों में किए गए प्रयासों से हासिल हुई है। किसानों ने फसल पद्धति में बदलाव कर आने वाली पीढ़ियों की जल सुरक्षा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
उन्होंने कहा कि प्रदेश अब क्रिटिकल विकासखंडों की संख्या शून्य तक पहुंच चुका है और इसी सामूहिक प्रयास के जरिए 2030 तक सभी विकासखंडों को भूजल की दृष्टि से सुरक्षित बनाने की दिशा में काम किया जाएगा।