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Raipur, Surajpur, and Korba Family Courts get new judges... High Court's major ruling on the powers of Lok Adalat.
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ में न्यायिक व्यवस्था से जुड़ी दो महत्वपूर्ण खबरें सामने आई हैं। प्रदेश के रायपुर, सूरजपुर और कोरबा परिवार न्यायालयों में नए न्यायाधीशों की नियुक्ति की गई है। वहीं, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई करते हुए लोक अदालतों के अधिकार क्षेत्र को लेकर अहम व्यवस्था दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लोक अदालत का मुख्य उद्देश्य पक्षकारों के बीच समझौता कराना है और समझौता नहीं होने की स्थिति में वह विवाद के गुण-दोष के आधार पर फैसला नहीं सुना सकती।
विधि एवं विधायी कार्य विभाग ने हाई कोर्ट की सहमति से उच्चतर न्यायिक सेवा के अधिकारियों के तबादले और नई पदस्थापना के आदेश जारी किए हैं। 13 सितंबर 2026 को जारी आदेश के मुताबिक आनंद कुमार ध्रुव को रायपुर परिवार न्यायालय का प्रधान न्यायाधीश नियुक्त किया गया है।आनंद कुमार ध्रुव इससे पहले रायपुर परिवार न्यायालय में ही तृतीय अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश के पद पर जिम्मेदारी संभाल रहे थे। नई पदस्थापना के बाद उन्हें अब इसी न्यायालय में प्रधान न्यायाधीश की जिम्मेदारी दी गई है।
पत्थलगांव के जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश संतोष कुमार तिवारी को सूरजपुर परिवार न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किया गया है।
इसी तरह कोरबा की द्वितीय जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश डॉ. ममता भोजवानी को कोरबा परिवार न्यायालय में न्यायाधीश की जिम्मेदारी सौंपी गई है।आदेश में सभी स्थानांतरित न्यायिक अधिकारियों को 16 सितंबर 2026 तक या उससे पहले नई पदस्थापना वाली जगह पर कार्यभार संभालने और इसकी रिपोर्ट संबंधित विभाग को भेजने के निर्देश दिए गए हैं।
दूसरी ओर, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने लोक अदालतों के अधिकार क्षेत्र को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की एकल पीठ ने कहा कि लोक अदालत का उद्देश्य आपसी सहमति और समझौते के जरिए विवाद का समाधान करना है।यदि पक्षकारों के बीच समझौता नहीं हो पाता है तो लोक अदालत खुद यह तय नहीं कर सकती कि विवाद में कौन सही है और कौन गलत। ऐसे मामले को संबंधित न्यायालय में वापस भेजना होता है, जहां पक्षकारों को सुनकर मामले का निर्णय गुण-दोष के आधार पर किया जा सकता है।
यह मामला सीएसपीडीसीएल के तहत काम करने वाले बिलासपुर के धुमा सिरगिट्टी निवासी छोटू उर्फ शत्रुघन की नौकरी के दौरान मौत से संबंधित था। मृतक के माता-पिता ने कर्मचारी मुआवजा अधिनियम के तहत करीब 9 लाख 880 रुपये मुआवजे की मांग की थी।मामले में सीएसपीडीसीएल ने जिम्मेदारी स्वीकार किए बिना मुआवजे की राशि जमा की थी। वहीं, ठेकेदार ने मृतक को अपना कर्मचारी मानने से इनकार किया था। इसके बाद विवाद लोक अदालत और श्रम न्यायालय की प्रक्रिया तक पहुंचा।
हाई कोर्ट ने मामले में 6 दिसंबर 2014 को राष्ट्रीय लोक अदालत, बिलासपुर की ओर से पारित आदेश और 15 जून 2015 के श्रम न्यायालय के आदेश को रद्द कर दिया।कोर्ट ने मामले को नए सिरे से श्रम न्यायालय को भेजते हुए सभी संबंधित पक्षों को सुनने के बाद कानून के अनुसार गुण-दोष के आधार पर निर्णय लेने का निर्देश दिया है। श्रम न्यायालय को दोबारा सुनवाई पूरी कर निर्धारित समय सीमा में फैसला करने के निर्देश भी दिए गए हैं।
हाई कोर्ट की इस व्यवस्था से लोक अदालतों की भूमिका को लेकर स्थिति स्पष्ट हुई है। लोक अदालत विवाद का समाधान तभी कर सकती है, जब दोनों पक्ष आपसी सहमति से समझौते के लिए तैयार हों। सहमति नहीं बनने पर लोक अदालत किसी एक पक्ष के पक्ष में मेरिट पर फैसला नहीं दे सकती।