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Say the word, and I’ll tell you: the moment a leaf so much as stirred, Goddess Bijli stormed off to the *Kop Bhavan* (the chamber of royal displeasure).
बिजली विभाग ने अपने विभाग से इतर एक और सेवा शुरू की है और वो है तेज हवाओं वाले मौसम की निःशुल्क जानकारी देने की ,यदि आप अपने घर में आराम की मुद्रा में बिस्तर पर लेटे हैं हैं और अचानक बिजली गोल हो जाए तो समझ लीजिए कि हवा सामान्य से थोड़ी बहुत तेज गति से चलने का माहौल बन रहा है। ऐसा नहीं कि मौसम में ये बदलाव पहले नहीं होते थे। मगर कम ही मौकों पर बिजली विभाग जानकारी देने की जरूरत समझता था। व्यवस्था इतनी पुख्ता रहती थी कि तेज हवाएं चलने पर भी बिजली सप्लाई पर कोई ज्यादा असर नहीं पड़ता था अब हालत ये है कि हल्की हवा से पेड़ों के पत्ते हिलने शुरू ही होते हैं और बिजली मैया कोप भवन में चली जाती हैं।बिजली विभाग के आला अफसरों के घर तो इनवर्टर समेत तमाम वैकल्पिक व्यवस्थाएं मौजूद रहती हैं सो वे क्या जानें कि अचानक बिजली चली जाने से होने वाली उमस भरी गर्मी कितनी तकलीफ़ देह होती है। सजा भुगतता है वो आम आदमी जो बिजली का बिल ईमानदारी से चुकाता है, हर साल बढ़ती बिजली दरों की मार झेलता है और जबरिया स्मार्ट मीटर लगाने जैसी गुंडई ख़ामोशी से बर्दाश्त करता है। असुविधा सिर्फ गर्मी से होने वाली परेशानी और आराम में खलल की नहीं है और भी कितनी परेशानियां हैं। पढ़ने वाले परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं और जरा सी हवा चलते ही बिजली चली जाती है ,आटा आधा पिसा है चक्की बंद हो जाती है, पानी की टंकी भरना है और बिजली नहीं है, टीवी देख रहे हैं सस्पेंस फिल्म का सस्पेंस सामने आने वाला है कि बिजली गोल, कार के पंक्चर टायर को सुधारने के बाद जैसे ही हवा भरने की शुरुआत हुई बिजली गायब, अब बैठे रहो बिना हवा के टायर को लेकर, कन्हा तक गिनाएं ये परेशानियां
सवाल ये है कि जब उपभोक्ता ईमानदारी से बिल चुकाता है तो उसे निर्बाध बिजली सप्लाई क्यों नहीं मिलना चाहिए। हर साल कंपनियां मैंटेनेंस पर लाखों रुपए खर्च करती हैं। पेड़ों की डालें निर्ममता से काटी जाती है। आम उपभोक्ता बिना सूचना किए जाने वाले शट डाउन की परेशानी झेलती है। तो फिर इस बारे सर्कस का फायदा ही क्या है ? ज़ुल्म तो ये भी है कि तथाकथित मेंटेनेंस पर होने वाला ये खर्च टैरिफ वृद्धि के माध्यम से जनता से ही वसूल किया जाता है,अगर बिजली कंपनी सुन रही है और उसे सचमुच उपभोक्ता की फ़िक्र है तो ऐसे तरीके अपनाए जिससे थोड़े से हवा पानी में ही बिजली गुल हो जाने की समस्या से निजात मिले। जहां तक मौसम की जानकारी का सवाल है तो उसके लिए सरकार ने मौसम विभाग बना कर रखा है पहले अपना डिपार्टमेंट सम्भाल लो फिर दूसरे डिपार्टमेंट में टाँग अड़ाना।
बुरे दिनों में ऐसा ही होता है
कहते हैं जब इंसान के बुरे दिन आते हैं तो सारे काम उल्टे होने लगते हैं वो जहां हाथ डालता है वहीं उसके सामने असफलता आकर खड़ी हो जाती है आजकल यही हाल है देश में 70 साल तक राज करने वाली कांग्रेस पार्टी का , अब देखो राज्यसभा की तीसरी सीट के लिए कितने दिन से लफड़ा चल रहा था कि किसको सीट मिलेगी, किसको उम्मीदवार बनाया जाएगा, चूंकि आजकल महिलाओं को लेकर सभी राजनीतिक दल बड़े चिंतित दिखाई दे रहे हैं इसलिए कांग्रेस ने मीनाक्षी नटराजन को कैंडिडेट बना दिया लेकिन बदकिस्मती तो देखो उनके नामांकन पत्र में एक छोटी सी गलती क्या हो गई रिटर्निंग ऑफिसर ने उनका फॉर्म ही निरस्त कर दिया, बेचारे कांग्रेसी रिटर्निंग ऑफिसर के दरवाजे से लेकर चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट पता नहीं कहां-कहां चले गए लेकिन "हाथ की आई शून्य" अब कह रहे हैं हम सड़कों पर आंदोलन करेंगे ,अरे भैया कितने सालों से राजनीति कर रहे हो, हजारों नामांकन फॉर्म भरे होंगे आपके नेताओं ने, बड़े-बड़े वकीलों की फौज है उसके बाद भी ऐसी गलती कि नामांकन फार्म ही रिजेक्ट हो गया। अब बीजेपी वाले मजा ले रहे हैं वे तो पहले से ही कह रहे थे कि तीनों सीटें हम ही जीतेंगे बीजेपी के इस कांफिडेंस से घबरा कर अपने विधायकों को कांग्रेस ने हिमाचल तो कहीं बेंगलुरु शिफ्ट करवाने का निर्णय ले किया । पत्नी और बाल बच्चों समेत सारे विधायक एयरपोर्ट पहुंच गए लेकिन अचानक खबर आई कि भैया वापस आ जाओ कहीं जाने की जरूरत नहीं है अपने प्रत्याशी का फॉर्म रिजेक्ट हो गया, यानी न केवल मीनाक्षी जी का ही टाइम खराब चल रहा है बल्कि पूरे कांग्रेस विधायकों की ही कुंडली में पता नहीं कौन से ग्रह बैठ गए हैं अब सड़कों पर लड़ाई लड़ने से क्या होने वाला है जो हाथ में था वो चला गया, अब लगाते रहो इलेक्शन पिटिशन कब सुनवाई होगी ,कब निर्णय होगा तब तक तो पांच साल बीत ही जाएंगे। अपनी तो सलाह है कांग्रेस वालों को ,भैया अपनी और अपनी पूरी पार्टी की कुंडली किसी अच्छे पंडित को दिखाओ कुछ पूजा पाठ करवाओ वरना ऐसी अलसेट खाते रहोगे।
बिछड़े सभी बारी-बारी
मशहूर फिल्मकार गुरुदत्त की क्लासिक फिल्म" प्यासा " का एक गाना "बिछड़े सभी बारी-बारी" पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता दीदी पर पूरी तरह सटीक बैठ रहा है। जब तक सत्ता में रही 15 साल उन तमाम लोगों ने खूब जमकर सत्ता की मलाई खाई दीदी दीदी कहते हुए उनकी जुबान नहीं रुकती थी टीएमसी के वो नेता जो आज अभिषेक बनर्जी को गाली दे रहे हैं उस वक्त उनकी चरण वंदना करने में कोई पीछे नहीं रहता था, लेकिन वक्त बदलते ही क्या हाल हो गया ममता दीदी का। चुनाव क्या हारी सारे संगीसाथी एक-एक करके बिछड़ने लगे क्या विधायक क्या सांसद, क्या नेता, सारे के सारे अभिषेक बनर्जी की तानाशाही का रोना रोने लगे, अरे भैया जब वो सत्ता में थे तब तानाशाह नहीं थे क्या ? उस वक्त तो आप लोग उनकी ऐसी पूजा करते थे मानो भगवान हों लेकिन जैसे ही सत्ता गई अब वो आपको तानाशाह नजर आने लगे , वैसे भी अब राजनीति में किसी का कोई भरोसा बचा नहीं है कब कौन कहां चला जाए, कौन कहां से इधर आ जाए इधर से उधर दौड़ लगा दे ये तो बहुत आसान बात हो गई है और सही भी है, नेता राजनीति में सत्ता के लिए ही तो आता है जैसे मक्खी शहद की तरफ दौड़ती है वैसे ही नेता भी तो सत्ता की तरफ दौड़ते हैं क्योंकि सारी इज्जत तो सत्ता के कारण ही रहती है , इसलिए ममता दीदी आप चिंता मत करो ये तो होना ही था फिर कभी भविष्य में सत्ता हाथ में आएगी तो यही लोग जो आज तरह-तरह की बातें कर रहे हैं फिर आपकी शरण में आएंगे देख लेना वक्त बदलते देर नहीं लगती।
सुपर हिट ऑफ द वीक
श्रीमान जी को अंग्रेजी बोलने का बुखार चढ़ा हुआ था और श्रीमती जी अंग्रेजी में जीरो थी
एक दिन श्रीमती जी ने स्वादिष्ट खाना बनाया और एक निवाला श्रीमान जी के गले में अटक गया खांसते खांसते उनकी मौत हो गई
किसी ने श्रीमती जी से पूछा
“क्या हो गया था उन्हें”
"कुछ नहीं एक ग्लास पानी भी नहीं मांग सके बेचारे "वॉटर वॉटर" करते करते मर गए