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Sickle cell disease can now be detected while the baby is still in the womb; at AIIMS Raipur, the test will be available at a cost up to 60% lower than that in private hospitals.
रायपुर। छत्तीसगढ़ में सिकल सेल जैसी आनुवंशिक बीमारी की पहचान के लिए अब गर्भावस्था के दौरान ही जांच कराना संभव होगा। रायपुर स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की जेनेटिक्स लैब को पीसीपीएनडीटी एक्ट के तहत पंजीयन मिल गया है। इसके साथ ही गर्भ में पल रहे शिशु की डीएनए आधारित जांच का रास्ता साफ हो गया है। इस सुविधा के लिए लगभग 800 से 1000 रुपये खर्च करने होंगे, जबकि निजी अस्पतालों में इसी तरह की जांच का खर्च करीब 2500 रुपये तक पहुंचता है।चिकित्सकों के मुताबिक, सरकारी संस्थान में इतनी कम कीमत पर यह सुविधा उपलब्ध होना प्रदेश के लिए महत्वपूर्ण पहल है। इससे उन परिवारों को विशेष लाभ मिलेगा, जिनमें पहले से आनुवंशिक बीमारियों का जोखिम मौजूद है। गर्भावस्था के दौरान ही शिशु की आनुवंशिक स्थिति का पता चलने से समय पर चिकित्सकीय सलाह, उचित देखभाल और आगे की उपचार संबंधी योजना बनाने में मदद मिलेगी।
रायपुर एम्स में जेनेटिक्स लैब की शुरुआत वर्ष 2023 में की गई थी। हालांकि, गर्भस्थ शिशु से संबंधित नमूनों की जांच के लिए आवश्यक पंजीयन प्रक्रिया पूरी होने में करीब एक से दो साल का समय लगा। अब तक इस प्रयोगशाला में मुख्य रूप से रक्त के नमूनों के जरिए आनुवंशिक बीमारियों की जांच की जाती थी। नए पंजीयन के बाद गर्भस्थ शिशु से जुड़े नमूनों का परीक्षण भी किया जा सकेगा।सिकल सेल के अलावा सिस्टिक फाइब्रोसिस और जीन में होने वाले बदलावों से संबंधित कुछ अन्य आनुवंशिक बीमारियों की पहचान भी इस सुविधा के जरिए संभव होगी।
यदि माता और पिता दोनों सिकल सेल ट्रेट यानी HBAS के वाहक हैं, तो प्रत्येक गर्भावस्था में बच्चे को तीन तरह की आनुवंशिक स्थितियों में से कोई एक हो सकती है।
25 प्रतिशत संभावना: बच्चे को सिकल सेल बीमारी यानी HbSS हो सकती है।
50 प्रतिशत संभावना: बच्चा सिकल सेल जीन का वाहक यानी HbAS हो सकता है।
25 प्रतिशत संभावना: बच्चे का हीमोग्लोबिन सामान्य यानी HbAA हो सकता है।
ये संभावनाएं हर गर्भावस्था में समान रूप से लागू होती हैं। इसका अर्थ है कि पहले बच्चे की आनुवंशिक स्थिति का अगले बच्चे पर कोई सीधा प्रभाव नहीं पड़ता। डीएनए जांच के जरिए गर्भस्थ शिशु की वास्तविक आनुवंशिक स्थिति का पता लगाया जा सकता है।
छत्तीसगढ़ में सिकल सेल बीमारी की रोकथाम और पहचान के लिए बड़े स्तर पर जांच अभियान चलाया गया है। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से 13 फरवरी 2026 को लोकसभा में दी गई जानकारी के मुताबिक, प्रदेश में 3 फरवरी 2026 तक 1.70 करोड़ से अधिक लोगों की सिकल सेल जांच की जा चुकी थी।इस दौरान 27,600 लोगों में सिकल सेल बीमारी की पुष्टि हुई, जबकि 3,38,774 लोग इसके वाहक पाए गए। इसके अलावा प्रदेश में एक करोड़ दो लाख से अधिक लोगों को जेनेटिक स्टेटस कार्ड भी जारी किए जा चुके हैं।
गर्भस्थ शिशु की आनुवंशिक जांच के लिए गर्भावस्था के 15वें से 20वें सप्ताह के बीच एम्नियोसेंटेसिस प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। इसमें गर्भ में शिशु के आसपास मौजूद एम्नियोटिक फ्लूड यानी एम्नियोटिक द्रव का नमूना लिया जाता है। इसके बाद डीएनए परीक्षण के जरिए आनुवंशिक बीमारी की स्थिति का पता लगाया जाता है।हालांकि, जांच का सही समय और इसकी आवश्यकता चिकित्सकीय परामर्श के आधार पर तय की जाएगी। यह एक चिकित्सकीय प्रक्रिया है, इसलिए इसके लाभ, संभावित जोखिम और विकल्पों की जानकारी विशेषज्ञ से लेना जरूरी है।