

Copyright © 2026 rights reserved by Inkquest Media
अन्य समाचार

Snapshot of elementary education in Chhattisgarh revealed; TLPS 2025 report released.
रायपुर। प्रारंभिक कक्षाओं में शिक्षण व्यवस्था को और प्रभावी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए लैंग्वेज एंड लर्निंग फाउंडेशन (एलएलएफ) ने टाटा ट्रस्ट और राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एससीईआरटी) छत्तीसगढ़ के सहयोग से 'टीचिंग एंड लर्निंग प्रैक्टिसेज सर्वे (टीएलपीएस) 2025' रिपोर्ट जारी की। रिपोर्ट का विमोचन एससीईआरटी रायपुर के कॉन्फ्रेंस हॉल में आयोजित कार्यक्रम के दौरान किया गया।यह सर्वे कक्षा पहली और दूसरी में पढ़ाई की वास्तविक स्थिति को समझने तथा शिक्षण पद्धतियों का आकलन करने के उद्देश्य से किया गया था। रिपोर्ट में सामने आए निष्कर्ष 'निपुण भारत मिशन' के तहत बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक दक्षता को मजबूत करने के लिए उपयोगी मार्गदर्शन प्रदान करेंगे।
शिक्षा जगत के विशेषज्ञ हुए शामिल
रिपोर्ट विमोचन समारोह में एससीईआरटी के अतिरिक्त संचालक जे. पी. रथ, एलएलएफ के राष्ट्रीय सलाहकार (बहुभाषी शिक्षा) पद्मश्री महेंद्र कुमार मिश्रा, शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारी, विभिन्न डाइट संस्थानों के प्राचार्य, समग्र शिक्षा के प्रतिनिधि, राज्य संसाधन समूह के सदस्य तथा शिक्षा क्षेत्र के विशेषज्ञ मौजूद रहे।सर्वेक्षण की रूपरेखा और कार्यप्रणाली की जानकारी एलएलएफ के सीनियर एकेडमिक स्पेशलिस्ट अजय गुप्ता ने दी, जबकि रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष सीनियर स्पेशलिस्ट (बहुभाषी शिक्षा) संजय गुलाटी ने प्रस्तुत किए।
100 कक्षाओं के अध्ययन पर आधारित रिपोर्ट
यह अध्ययन नवंबर 2024 से मार्च 2025 के बीच कबीरधाम और नारायणपुर जिलों के स्कूलों में किया गया। सर्वे के दौरान 100 कक्षाओं का विस्तृत अवलोकन कर शिक्षण प्रक्रियाओं, बच्चों की सहभागिता और कक्षा प्रबंधन से जुड़े विभिन्न पहलुओं का मूल्यांकन किया गया।
गलतियों से सीखने का माहौल जरूरी'
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए एससीईआरटी के अतिरिक्त संचालक जे. पी. रथ ने कहा कि स्कूलों में ऐसा वातावरण बनाना आवश्यक है, जहां बच्चे बिना किसी भय के अपनी गलतियों को स्वीकार कर सकें और उनसे सीख सकें।उन्होंने कहा कि वास्तविक शिक्षा वहीं से शुरू होती है, जब छात्र निडर होकर अपनी त्रुटियों को स्वीकार करते हैं। उनके अनुसार एक प्रभावी शिक्षक केवल उत्तर देने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि ऐसे प्रश्न छोड़ता है जो बच्चों में जीवनभर सीखने की जिज्ञासा बनाए रखते हैं।
बहुस्तरीय कक्षाओं की चुनौतियां और संभावनाएं
टाटा ट्रस्ट की डिप्टी हेड ऑफ प्रोग्राम्स एवं हेड ऑफ एजुकेशन अमृता पटवर्धन ने कहा कि यह रिपोर्ट केवल योजनाओं की जानकारी नहीं देती, बल्कि कक्षा के भीतर शिक्षण और अधिगम के वास्तविक अनुभवों को भी सामने लाती है।उन्होंने बताया कि सर्वे में शामिल 84 प्रतिशत स्कूलों में एक ही कक्षा में अलग-अलग स्तर के बच्चों को पढ़ाया जा रहा है। ऐसी व्यवस्था जहां कुछ नए अवसर पैदा करती है, वहीं कई चुनौतियां भी सामने लाती है। रिपोर्ट से यह समझने में मदद मिलेगी कि बहुभाषी शिक्षा, शिक्षण सामग्री और बहुस्तरीय कक्षाओं के संचालन को और प्रभावी बनाने के लिए किन क्षेत्रों में सुधार की आवश्यकता है।
नीतियों से अधिक महत्वपूर्ण क्रियान्वयन
कार्यक्रम में शिक्षा विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि किसी भी शिक्षा नीति की सफलता उसके जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन पर निर्भर करती है।डाइट जशपुर के प्राचार्य एम. जेड. यू. सिद्दीकी ने कहा कि उत्कृष्ट नीतियां और पर्याप्त संसाधन तभी सार्थक साबित होते हैं, जब उनका सकारात्मक प्रभाव सीधे कक्षा में दिखाई दे। वहीं एससीईआरटी की राज्य स्रोत समूह सदस्या पुष्पा शुक्ला ने बच्चों के सीखने के परिणाम बेहतर बनाने के लिए शिक्षण प्रक्रियाओं में बदलाव को जरूरी बताया।
भाषाई विविधता को समझने का माध्यम बनी रिपोर्ट
एलएलएफ के संस्थापक एवं एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर डॉ. धीर झिंगरन ने कहा कि छत्तीसगढ़ की सामाजिक, भाषाई और भौगोलिक विविधता उसकी कक्षाओं में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।उनके अनुसार टीएलपीएस रिपोर्ट यह समझने का अवसर देती है कि बच्चे सीखने की प्रक्रिया में किस तरह भागीदारी करते हैं, शिक्षक विभिन्न भाषाई और शैक्षणिक जरूरतों के अनुरूप कैसे पढ़ाते हैं तथा किन क्षेत्रों में सुधार की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि शुरुआती शिक्षा को मजबूत बनाने के लिए शिक्षकों और मेंटर्स को निरंतर शैक्षणिक सहयोग उपलब्ध कराना जरूरी है।
टीएलपीएस 2025 रिपोर्ट में कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए हैं:-
66 प्रतिशत शिक्षक बच्चों की मातृभाषा से परिचित पाए गए।
82 प्रतिशत कक्षाओं में समूह या व्यक्तिगत गतिविधियों के दौरान बच्चों के कार्यों की नियमित निगरानी नहीं की जा रही थी।
70 प्रतिशत कक्षाओं में विद्यार्थियों के सीखने के स्तर के अनुरूप शिक्षण पद्धतियों में अपेक्षित बदलाव नहीं दिखा।
बच्चों की सक्रिय भागीदारी बढ़ाने की आवश्यकता महसूस की गई।
शिक्षण गतिविधियों को बच्चों के दैनिक जीवन और अनुभवों से जोड़ने पर जोर दिया गया।
कक्षा शिक्षण में मातृभाषा के अधिक प्रभावी उपयोग की जरूरत रेखांकित की गई।
एलएलएफ का लक्ष्य: कोई बच्चा पीछे न छूटे
वर्ष 2015 में स्थापित लैंग्वेज एंड लर्निंग फाउंडेशन एक गैर-लाभकारी संस्था है, जो सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक दक्षता को मजबूत करने के लिए विभिन्न राज्य सरकारों के साथ काम कर रही है।
संस्था का कार्य तीन प्रमुख क्षेत्रों पर केंद्रित है:
शिक्षकों और मेंटर्स का क्षमता विकास
एलएलएफ शिक्षकों को बाल-केंद्रित, आधुनिक और बहुभाषी शिक्षण पद्धतियों के प्रभावी उपयोग के लिए प्रशिक्षित करती है, ताकि बच्चों की समझ और सीखने की गुणवत्ता बेहतर हो सके।
मॉडल शिक्षण कार्यक्रमों का संचालन
जिला स्तर पर संचालित डेमोंस्ट्रेशन कार्यक्रमों के माध्यम से संस्था बहुभाषी शिक्षण सामग्री और नवाचार आधारित रणनीतियों का उपयोग कर कक्षा शिक्षण को मजबूत बनाने का प्रयास करती है।
शिक्षा व्यवस्था को संस्थागत मजबूती
एलएलएफ राज्य और जिला स्तर के शिक्षा विभागों के साथ मिलकर नीतियों के प्रभावी क्रियान्वयन और अकादमिक सहयोग को मजबूत करती है, ताकि सुधार लंबे समय तक टिकाऊ बने रहें।
10 राज्यों में करोड़ों बच्चों तक पहुंच
संस्था के अनुसार अब तक एलएलएफ ने देश के 10 राज्यों में 2.18 करोड़ बच्चों और 11.8 लाख शिक्षकों तक अपनी पहुंच बनाई है। इसके अलावा जिला स्तर पर 14 लाख बच्चों के सीखने के परिणामों में सकारात्मक सुधार दर्ज किया गया है।
टीएलपीएस 2025 रिपोर्ट को शुरुआती शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की दिशा में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जा रहा है, जो भविष्य की शैक्षणिक रणनीतियों और नीतिगत निर्णयों के लिए उपयोगी आधार प्रदान करेगा।