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Supreme Court's strong observation: It is wrong to drag the entire in-laws into a marital dispute.
नई दिल्ली। वैवाहिक रिश्तों में दरार केवल पति-पत्नी तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उसका असर पूरे परिवार पर पड़ता है। ऐसे संवेदनशील मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि केवल सामान्य और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर पति के सभी रिश्तेदारों को आपराधिक मामलों में घसीटना उचित नहीं है।
मध्य प्रदेश के मामले में FIR और घरेलू हिंसा केस रद्द
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने मध्य प्रदेश के एक वैवाहिक विवाद से जुड़े मामले में पति के परिवार के चार सदस्यों के खिलाफ दर्ज एफआईआर और घरेलू हिंसा का मामला रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि वैवाहिक विवादों में अक्सर गुस्सा, तनाव और कड़वाहट के कारण आरोप बढ़ा-चढ़ाकर लगाए जाते हैं।
“कानून प्रतिशोध का माध्यम नहीं बन सकता”
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पीड़ित महिला की पीड़ा और शिकायतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन आपराधिक कानून का इस्तेमाल व्यक्तिगत बदले या पारिवारिक प्रतिशोध के लिए भी नहीं होना चाहिए। अदालत ने कहा कि बिना ठोस और स्पष्ट साक्ष्यों के परिवार के हर सदस्य को आरोपी बनाना न्यायसंगत नहीं है।
रिश्तेदारों के खिलाफ आरोप हों स्पष्ट और तथ्यात्मक
पीठ ने अपने फैसले में कहा कि किसी भी रिश्तेदार के खिलाफ कार्रवाई तभी उचित होगी, जब उसके खिलाफ लगाए गए आरोप विशिष्ट, स्पष्ट और प्रथम दृष्टया साक्ष्यों से समर्थित हों। केवल पारिवारिक संबंध होने के आधार पर किसी को आरोपी नहीं बनाया जा सकता।
अदालत ने संतुलन बनाए रखने पर दिया जोर
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायपालिका की जिम्मेदारी है कि वह महिलाओं की सुरक्षा और कानून के दुरुपयोग दोनों के बीच संतुलन बनाए रखे। अदालत ने यह भी माना कि वैवाहिक विवादों में भावनात्मक परिस्थितियां अक्सर आरोपों को प्रभावित करती हैं, इसलिए हर मामले की सावधानीपूर्वक जांच जरूरी है।