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The End of Maoism: Operation Clean Sweep from Saranda to Bastar
नई दिल्ली। भारत के लिए माओवाद का काला दाग अब समाप्ति की ओर है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा निर्धारित 31 मार्च की समयसीमा के करीब आने के साथ सुरक्षा बलों ने बचे-खुचे माओवादी ठिकानों को खत्म करने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। यह केवल सैन्य अभियान नहीं, बल्कि दशकों की हिंसा और संघर्ष के बाद शांति की दिशा में एक निर्णायक कदम है।
सुरक्षा बलों की रणनीति
सरंडा से बस्तर तक ‘आपरेशन क्लीन स्वीप’ के तहत सुरक्षा बलों ने बचे हुए 130-150 सशस्त्र माओवादी कैडरों को निशाना बनाया है। छत्तीसगढ़ की ‘कोबरा’ इकाइयां झारखंड के पश्चिम सिंहभूम जिले के जंगलों में भेजी गई हैं। बस्तर के कठिन जंगलों में सीआरपीएफ, बीएसएफ और आइटीबीपी की टीमें माओवादियों को या तो आत्मसमर्पण के लिए मजबूर कर रही हैं या मुठभेड़ में उन्हें बेअसर कर रही हैं।
माओवादी नेताओं की तलाश
अधिकारियों के अनुसार माओवादी नेता मिसिर बेसरा की खोज तेज है, जबकि ‘रमन्ना’ और अन्य बड़े नेताओं के आत्मसमर्पण की खबरें सामने आ रही हैं। महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और ओडिशा की सीमाओं पर साझा ‘क्रॉस-बार्डर’ आपरेशन भी चलाया जा रहा है ताकि माओवादी किसी भी छिपे हुए ठिकाने पर सुरक्षित न रह सकें।
विकास और सुरक्षा का नया ब्लूप्रिंट
केंद्र सरकार ने अब सिर्फ सैन्य कार्रवाई तक सीमित नहीं रहकर, विकास के जरिए लोगों के दिल जीतने की योजना भी बनाई है। 31 मार्च के बाद ‘आपरेशन एंड डेवलपमेंट’ ब्लूप्रिंट पेश किया जाएगा। इसके तहत नक्सल प्रभावित क्षेत्रों से लगभग पांच अर्द्धसैनिक बटालियनों की वापसी हो सकती है। बस्तर का 96 प्रतिशत क्षेत्र अब नक्सल मुक्त माना जा रहा है।
एनएसजी और डी-माइनिंग अभियान
सीआरपीएफ की बम निरोधक टीमें और डी-माइनिंग अभियान जंगलों में बिछाए गए बारूद को साफ करेंगे। कभी 76 जिलों में फैला यह नासूर अब केवल सात जिलों तक सीमित हो गया है: बीजापुर, नारायणपुर, सुकमा, कांकेर, दंतेवाड़ा, पश्चिम सिंहभूम और कंधमाल। 1967 में नक्सलबाड़ी से शुरू हुए इस खूनी सफर में 17,000 निर्दोषों की जान गई, अब इसका अंत दिख रहा है।