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The Supreme Court issued a strong statement, stating that information from WhatsApp University should not be trusted. The court gave a clear message during the hearing of religious cases.
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि वह प्रतिष्ठित लेखकों और विचारकों के विचारों का सम्मान करता है, लेकिन व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी से मिलने वाली जानकारी को स्वीकार नहीं किया जा सकता। यह टिप्पणी सबरीमाला मंदिर सहित धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान आई।
संविधान पीठ में चली बहस, लेख और विचारों का दिया गया हवाला
नौ जजों की संविधान पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान दाऊदी बोहरा समुदाय की ओर से पेश अधिवक्ता ने एक प्रमुख राजनीतिक नेता के लेख का हवाला देते हुए न्यायिक संयम की बात रखी। इस पर प्रधान न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि अदालत सभी विद्वानों और न्यायविदों के विचारों का सम्मान करती है, लेकिन व्यक्तिगत राय को अंतिम आधार नहीं माना जा सकता।
ज्ञान के स्रोतों पर चर्चा, लेकिन ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ पर साफ इनकार
बहस के दौरान यह तर्क भी सामने आया कि ज्ञान किसी भी स्रोत से मिल सकता है और उसे स्वीकार करना चाहिए। इस पर पीठ की एक महिला न्यायाधीश ने हल्के अंदाज में कहा कि व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी से प्राप्त जानकारी को स्वीकार नहीं किया जा सकता। यह टिप्पणी अदालत के रुख को साफ तौर पर दर्शाती है कि निर्णय केवल विश्वसनीय और प्रमाणिक तथ्यों के आधार पर ही होंगे।
धार्मिक प्रथाओं को परखना अदालत के लिए जटिल चुनौती
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि किसी भी धार्मिक परंपरा को आवश्यक या अनावश्यक घोषित करने के लिए स्पष्ट मानक तय करना बेहद कठिन काम है। अदालत ने संकेत दिया कि ऐसे मामलों में संतुलन और संवैधानिक मूल्यों को ध्यान में रखते हुए फैसला लेना जरूरी होता है।
सबरीमाला फैसले का संदर्भ, महिलाओं के प्रवेश पर ऐतिहासिक निर्णय
इस सुनवाई के दौरान 2018 के उस ऐतिहासिक फैसले का भी जिक्र हुआ, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को असंवैधानिक करार देते हुए हटा दिया था। अदालत ने तब इसे समानता और अधिकारों के खिलाफ माना था।
न्यायपालिका का संकेत, फैसले तथ्य और संविधान पर आधारित होंगे
अदालत की इस टिप्पणी को एक स्पष्ट संदेश के रूप में देखा जा रहा है कि न्यायिक निर्णय किसी भी अप्रमाणित या सोशल मीडिया आधारित जानकारी पर नहीं, बल्कि ठोस तथ्यों, कानून और संविधान के आधार पर ही लिए जाएंगे।