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Two key High Court rulings: Sentence relief for a road accident convict; refusal to classify loan recovery efforts as abetment to suicide.
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने वर्ष 2006 में हुए एक भीषण सड़क हादसे से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए दोषी चालक को सजा में राहत दी है। अदालत ने दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन एक वर्ष की सजा को घटाकर आरोपी द्वारा पहले ही जेल में बिताई गई अवधि तक सीमित कर दिया। हालांकि अदालत ने जुर्माने की राशि बढ़ाकर 10 हजार रुपये कर दी है, जिसे मृतकों के परिजनों को मुआवजे के रूप में देने का निर्देश दिया गया है।
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि आरोपी निर्धारित जुर्माना जमा नहीं करता है तो उसे तीन माह का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा। इस फैसले के बाद दोषी को दोबारा जेल नहीं जाना पड़ेगा, लेकिन उसके खिलाफ दोषसिद्धि का रिकॉर्ड यथावत रहेगा।
यह दुर्घटना 21 अप्रैल 2006 की रात धमतरी जिले में हुई थी। शादी समारोह से लौट रहे लोगों से भरी तेज रफ्तार टाटा सूमो सम्बलपुर नहर पुल के पास एक मेटाडोर से टकरा गई थी। इस हादसे में चार लोगों की मौत हो गई थी, जबकि आठ अन्य घायल हुए थे। वर्ष 2011 में धमतरी की न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत ने चालक रोमू साहू को एक वर्ष की सजा सुनाई थी, जिसके खिलाफ उसने हाई कोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की थी।
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने अदालत को बताया कि घटना के समय आरोपी की उम्र 27 वर्ष थी और वह करीब 20 वर्षों से मुकदमे का सामना कर रहा है। इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए न्यायमूर्ति रजनी दुबे की एकल पीठ ने दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए सजा में राहत प्रदान की।
इसी बीच हाई कोर्ट ने एक अन्य महत्वपूर्ण मामले में भी बड़ा कानूनी सिद्धांत स्पष्ट किया है। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति से उधार की रकम वापस मांगना, बार-बार संपर्क करना या कानूनी कार्रवाई की चेतावनी देना मात्र इस आधार पर आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण नहीं माना जा सकता।
यह मामला धमतरी जिले के बलियारा गांव का है, जहां 17 जून 2014 को तत्कालीन सरपंच बलराम मंडावी का शव खेत में मिला था। जांच में सामने आया कि उन्होंने कीटनाशक का सेवन कर आत्महत्या की थी। घटनास्थल से मिले सुसाइड नोट में ठेकेदार अशोक कुमार वाधवानी का नाम होने के बाद उनके खिलाफ मामला दर्ज किया गया था।
धमतरी की विशेष अदालत ने ठेकेदार को अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण कानून से बरी कर दिया था, लेकिन भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के तहत सात वर्ष की सजा सुनाई थी। हाई कोर्ट ने इस फैसले को कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण मानते हुए रद्द कर दिया और आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि गवाहों के बयान और सुसाइड नोट का अध्ययन करने पर ऐसा कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आया, जिससे यह साबित हो सके कि आरोपी ने मृतक को इस हद तक प्रताड़ित या अपमानित किया था कि उसे आत्महत्या के लिए उकसाया गया हो। इसी आधार पर मृतक के परिजनों की ओर से सजा बढ़ाने और एट्रोसिटी एक्ट के तहत कार्रवाई की मांग वाली अपील भी खारिज कर दी गई।