

Copyright © 2026 rights reserved by Inkquest Media
अन्य समाचार

VSK app row: Digital attendance sparks controversy
रायपुर। स्कूलों में शिक्षकों की उपस्थिति दर्ज करने के लिए लागू किए गए VSK ऐप को लेकर प्रदेश में विवाद गहराता जा रहा है। जहां शिक्षा विभाग इसे पारदर्शिता और अनुशासन का नया माध्यम बता रहा है, वहीं शिक्षक इसे अपनी निजता में दखल मान रहे हैं। अब यह मामला अदालत तक पहुंच चुका है, जिससे पूरे शिक्षा तंत्र में असमंजस की स्थिति बन गई है।
डिजिटल सिस्टम पर सवाल, अदालत में चुनौती
दरअसल, विभाग ने पारंपरिक हस्ताक्षर प्रणाली को खत्म कर डिजिटल अटेंडेंस अनिवार्य कर दी है। इसके तहत शिक्षकों को स्कूल पहुंचने और छुट्टी के समय मोबाइल ऐप के जरिए उपस्थिति दर्ज करनी होती है। प्रदेश भर में लगभग एक लाख शिक्षकों ने यह ऐप डाउनलोड भी कर लिया है।
हालांकि, इस व्यवस्था के खिलाफ एक शिक्षक ने अदालत में याचिका दायर की है। याचिका में तर्क दिया गया है कि निजी मोबाइल का उपयोग सरकारी काम के लिए बाध्य करना उचित नहीं है। मोबाइल में आधार, बैंकिंग और अन्य संवेदनशील जानकारी मौजूद रहती है, ऐसे में किसी ऐप को अनिवार्य करना निजता के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है। अदालत ने इस मामले में स्कूल शिक्षा विभाग से जवाब मांगा है और दो अप्रैल तक पक्ष रखने के निर्देश दिए हैं।
शिक्षक संघ की दो टूक: तकनीक से नहीं, सुरक्षा से है चिंता
शालेय शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष वीरेंद्र दुबे ने स्पष्ट किया कि उन्हें तकनीक से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन डेटा सुरक्षा और गोपनीयता सुनिश्चित होना जरूरी है। उनका कहना है कि किसी भी ऐप को इंस्टॉल करते समय कैमरा, लोकेशन और अन्य डेटा एक्सेस की अनुमति देनी पड़ती है, जिससे निजी जानकारी के दुरुपयोग का खतरा बढ़ जाता है।
उन्होंने यह भी कहा कि आज के दौर में साइबर अपराध, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डीपफेक जैसी तकनीकों के बढ़ते खतरे को देखते हुए इस तरह के प्रयोग जोखिम भरे हो सकते हैं।
नेटवर्क और संसाधनों की कमी भी बड़ी समस्या
शिक्षकों ने यह मुद्दा भी उठाया कि कई स्कूलों में नेटवर्क और सर्वर की समस्या पहले से बनी हुई है। ऐसे में डिजिटल अटेंडेंस सिस्टम व्यवहारिक नहीं है। यदि विभाग के पास खुद का मजबूत सिस्टम नहीं है, तो शिक्षकों के निजी संसाधनों पर निर्भर रहना उचित नहीं माना जा सकता।
जवाबदेही पर भी उठे सवाल
शिक्षकों ने यह भी पूछा है कि यदि भविष्य में डेटा लीक या साइबर ठगी जैसी घटनाएं होती हैं, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा। इस पूरे मामले ने न केवल तकनीकी व्यवस्था बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
पायलट प्रोजेक्ट रोकने की मांग
शिक्षक संगठनों ने फिलहाल इस डिजिटल अटेंडेंस व्यवस्था को पायलट स्तर पर ही रोकने की मांग की है। उनका कहना है कि पहले सुरक्षा और तकनीकी ढांचे को मजबूत किया जाए, उसके बाद ही इसे लागू किया जाना चाहिए।