

Copyright © 2026 rights reserved by Inkquest Media
अन्य समाचार

कानून व्यवस्था बनाए रखने और भृष्टाचार निवारण हेतु जिम्मेदार दो सरकारी संस्थानों से जुड़ी खबरें सुर्खियों में हैं। दुखद यह है कि ख़बरें इनकी कार्यकुशलता को लेकर नहीं बल्कि इनकी छवि को दागदार बनाने से संबंधित हैं।
भोपाल में मॉडल और एक्ट्रेस त्विशा शर्मा की बहुचर्चित संदिग्ध मौत के मामले में भोपाल पुलिस की कार्यप्रणाली शुरु से ही ढुलमुल और लापरवाही भरी रही। मामले को आत्महत्या बताने की जल्दबाजी में मृतका के शरीर पर मौत से पहले के 7 गंभीर घाव/चोटों को नजरअंदाज करने जैसे गंभीर आरोपों की हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान भी पुष्टि हुई और सरकार को केस सीबीआई को ट्रांसफर करना पड़ा। सीबीआई को बेतरतीब और आधी-अधूरी केस डायरी सौंपी गई उसमें घटनाक्रम का कोई निश्चित क्रम दर्ज नहीं था। एम्स के डॉक्टरों के पैनल के सामने पोस्टमार्टम के समय घटना में इस्तेमाल किया गया फंदा पेश न करने जैसी बड़ी प्रक्रियात्मक चूक भी हुई। मृतका के परिजनों ने आरोप लगाया कि आरोपी पति समर्थ सिंह और सास गिरीबाला सिंह, जो रिटायर्ड जज हैं, के रसूख के कारण भोपाल पुलिस ने शुरुआती कार्रवाई नहीं की और आरोपियों को साक्ष्य प्रभावित करने का मौका मिला।
दूसरे घटनाक्रम में एक प्रतिष्ठित अखबार के स्टिंग ऑपरेशन में शीर्ष भ्रष्टाचार निरोधक संस्था लोकायुक्त के तकनीशियन, हेड कांस्टेबल यहां तक कि डीएसपी स्तर के अधिकारी रिश्वत लेकर ट्रैप केस और जांच रिपोर्ट्स को कमजोर करते कैमरे में पकड़े गए। लोकायुक्त संगठन के भीतर ही घूस का यह नेटवर्क लाखों के बदले ट्रैप मामलों के आरोपियों को मामलों की ट्रांसक्रिप्ट और वॉयस सैंपल को मैनेज करने के लिए 3 से 5 लाख रुपए तक लेकर राहत दिलाने की डील कर रहा था।
त्विशा शर्मा मामले में सरकार द्वारा खुद मामला सीबीआई को सौंपे जाने का प्रस्ताव पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है और इस तथ्य की परोक्ष स्वीकृति है कि पुलिस दबाव में काम करती है। दूसरे मामले में लोकायुक्त के शीर्ष नेतृत्व द्वारा फौरन एक्शन लेते हुए 2 डीएसपी को पद से हटाकर पुलिस मुख्यालय अटैच और अन्य 3 कर्मचारियों को सस्पेंड किया जाना भी परोक्ष स्वीकारोक्ति है कि सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। इन बातों में दम है जांच एजेंसियां भ्रष्टाचारियों को सजा दिलाने के बजाय उन्हें क्लीन चिट देने का काम कर रही हैं।
पुलिसिया व्यवस्था में जनता के घटते भरोसे को लेकर उठने वाले सवाल नये नहीं हैं। छतरपुर जिले में महज दो महीनों के भीतर हिरासत में 4 युवकों की संदिग्ध मौतें हुईं। परिजनों ने पुलिस हिरासत में मारपीट और मानसिक प्रताड़ना के आरोप लगाए, जिसके बाद यह मामला मध्य प्रदेश हाईकोर्ट तक पहुंच गया। इंदौर में आपराधिक मुकदमों में कोर्ट में पेश किए जाने वाले गवाहों को लेकर बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया। विभिन्न थानों के सैंकड़ों मुकदमों में मात्र दो लोगों को ही गवाह बनाया गया था। समय पर गवाह पेश न करने पर कोर्ट में गंभीर सवाल उठते रहे हैं। रिश्वत और वसूली की खबरें जब तब सुर्खियां बनती हैं। पुलिस थानों और उच्चाधिकारियों के बीच तनाव की खबरें भी आती रहती हैं। नीमच और दतिया जिलों में हेड कांस्टेबल व एएसआई द्वारा वरिष्ठ अधिकारियों के दबाव और भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए आत्महत्या करने जैसी दुखद घटनाओं ने विभाग के अंदर की स्थिति उजागर की है। जन आक्रोश भी मुखर होता दिखाई देता रहता है। खरगोन के चैनपुर और अन्य क्षेत्रों में संदिग्ध मौतों की सूचना के बाद पुलिस के मौके पर देरी से पहुंचने पर ग्रामीणों की नाराजगी सामने आई और कई जगह जनता ने पुलिस का विरोध किया। इन चुनौतियों के बीच पुलिस प्रशासन की छवि सुधारने और जन-संवाद बढ़ाने के प्रयास हो रहे हैं। उच्चाधिकारियों द्वारा थानों में 'जनसुनवाई', पुलिस पंचायत, और महिला सुरक्षा जैसे अभियानों के जरिए जनता का भरोसा दोबारा जीतने की कोशिशें भी दिखती हैं।मगर अविश्वास की दीवार ढहाने के लिए आंतरिक साफ सफाई में और भी सशक्त कदमों की जरूरत है जो न सिर्फ जनता का भरोसा जीतें बल्कि विभाग के अंदर के ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ कार्मिकों का आत्मविश्वास भी मजबूत करें।
लोकायुक्त की कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में है। भोपाल की स्पेशल कोर्ट ने एक अवधि विशेष में लोकायुक्त द्वारा पेश की गई सभी पैंतीस खात्मा रिपोर्टों को सबूतों की कमी का हवाला देकर खारिज कर दिया। पिछले 3 वर्षों में लोकायुक्त द्वारा रिश्वतखोरी के मामलों में ट्रैप की कार्रवाई तो 28% तक बढ़ी है, लेकिन अदालत में केस साबित न होने के कारण सजा दिलाने के मामलों में भारी गिरावट आई है। अपराध सिद्धि की अनुपस्थता में आरोपी मज़े से निलंबन अवधि के बाहर आकर पुराने वेतन भत्ते उठाते हैं। भुगतती वह निरपराध आम जनता है जिसके पैसे से यह होली खेली जाती है।
फसल को बचाने के लिए बाड़ लगाने की परंपरा है। पुलिस और लोकायुक्त जैसी संस्थाएं वस्तुत: आमजन के भले के लिए लगाई गई बाड़ ही हैं। कहावत है कि जब बाड़ ही खेत को खाने लगे तो उसे कतरना जरूरी हो जाता है। आम जनमानस में यह धारणा घर कर गई है कि सारा किया धरा ऊपर तक के लोगों की संलिप्तता का है। इस ऊपर की सीमा कहां तक जाती है, बताना जरूरी नहीं है। नीचे के झाड़ झंखाड़ काटने से कोई ज्यादा फायदा नहीं दिखता। सफाई ऊपरी स्तर पर भी जरूरी है। अविश्वास के इन क्षणों में विश्वास जगाने के लिए कदम उठाए जाने जरूरी हैं और बहु प्रतीक्षित भी। लगता तो नहीं मगर उम्मीद पे दुनिया कायम है।